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ISSN 2292-9754

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05.03.2016


भ्रम

मै एक पुरुष हूँ।
एक बेटा, एक पुत्र।
मै भिन्न नहीं।
बस! भिन्न हैं मेरे कंधे।
मेरे इन्हीं निर्बल कन्धों पर
अदृश्य आशाएँ हैं।
अदृश्य अपेक्षाएँ हैं।
आशाएँ! पिता की।
आशाएँ! माता की।
अपेक्षाएँ! परिजनों की।
अपेक्षाएँ! समाज की।
मै जीता हूँ हर क्षण
इन सबका भार लिए।
मै परखा जाता हूँ हर क्षण
सफलताओं की कसौटी पर।
सफलता! जो अपरिभाषित है।
इन सबके मध्य
कहीं खो गया है जीवन।
जीवन! जो मैंने चाहा था।
जीवन! जो सुन्दर था।
जीवन! जो मेरा था।
और आज मै सफल हूँ।
सफल! अपने हितैषियों के लिए।
और उनकी तालियों की गड़गड़ाहट में
कहीं चुप सी हो गयी है मेरी चित्कार।


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