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ISSN 2292-9754

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05.03.2016


बेबसी

चुपचाप पड़ी है वह
गुमसुम, निःशब्द।
स्थिर जैसे निष्प्राण।
कोसती ख़ुद को
चुप्पी से ख़ुद के।
सिसकियाँ लेती
हवा के आत्मीय एहसास से।
जैसे बिलख रही हो
बर्बादी पर हर एक क्षण।
काली मैली-कुचली
जैसे काले पानी की सज़ा।
नाक दबाये मुसाफ़िरों को
निहारती पुकारती।
हाँ! मुसाफ़िर।
जो कभी नाकों को दबाये
समर्पित करते थे ख़ुद को।
उभरी चट्टानें
जैसे हृदय हों उसका।
अनगिनत जीवनों से वंचित
पालती जल्कुम्भियों को।
उफनती थीं, बलखाती थीं।
लहराती थीं, इतराती थीं।
सवाल पूछती हैं
स्थिर लहरें इसकी।
सवाल पूछती हैं मछलियाँ
सवाल पूछती है यह नदी।
यह नदी जो कभी बहती थी।


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