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03.09.2008
उन्मुक्त तरंग
अरविन्द चौहान

रह रह कर उमड़ आती हैं तरंगें मेरे मन में
मन करे कि हाथ बढ़ा कर कैद कर लूँ इन्हें मुठ्ठी में

न कलम चाहिए न कागज़ बस वो तरंग चाहिए
हिमालों से बहकर जिसकी अनुगूँज बस जाए मुझ में

मेरी वादियों को छूकर फूलों के बीच से सुरभित
हल्के से मेरी वादियों की शैफालियाँ बसा जाए मुझ में

शैलों की गोद से उमड़ती नदियों से निकलती निश्चल
हौले से उन्मादित कर मकरंद फैला जाए मुझ में

रंगों के अनगिनत छींटे हैं पड़े अमिट मेरे मन में
इनकी फुहारों से सराबोर हो जाए साँसें मुझ में

बह जाना चाहता हूँ मैं तो बस इन तरंगों में उन्मुक्त
फिर क्या फर्क पड़ता है कि मैं इन में समा जाऊँ या ये मुझ में

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