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| 12.24.2007 |
| प्यार तुमसा त्याग तुमसा शाश्वत अरविन्द चौहान |
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आँखों से आँसूँ झरे झिलमिल मोती बने
अविरल नीर बहे अनवरत झरने बने। भरी धूप में अनायास ही तूफान बने घनघोर सी घटा आई अन्धकार बने। मुस्कुराते होंठ ठिठके और गुम बने साँसें हैं मुर्झाई सी और हम बेदम बने। नम आँखों से बस अब यह एहसास बने रीते नैनों से अब तो बस फूल बने। नही है बस अब ताकत कि दूरी बने तेरी छाँव से निकल मुझमें अँगार बने। छाँव चाहिए शीतल चाहिए बस अब संगम बने इस सागर मंथन में अब तो बस अमृत बने। सिर्फ प्यार कहने से कभी प्यार नहीं बने प्यार तुमसा त्याग तुमसा शाश्वत ही बस प्यार बने। |
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