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03.18.2008
होली.... रंगो का त्यौहार
अरविन्द चौहान

रक्तिम लाली लिए छटा है आई
फाग बसंत ने सुरभि है बरसाई
रस रंग ने सबको किया सराबोर
जिंदगी को ईंद्रधनुष से दिया है भर।

नाचें गाएँ सब और हो हुड़दंग
ठंडाई पी सबको नचाए भंग
ढोल बजें और बाजे जब चंग
बच्चे बूढ़े भी नाचें संग संग।

गोरियों ने भी है बनाई टोली
इनके बिना न होगी पूरी होली
भिगा सबको खुद न आएँ हाथ
कहें हिम्मत हो तो खेलो साथ।

रंगो के इस खेल में
गुलाल और अबीर के मेल में
भूल द्वेष विषाद मन के सब
बह जाएँ खुशियों में सब।

रंगो को इस पावन अवसर पर,
सुर्ख रंग की बौछारें कर
आओ बाँटे प्यार अपार,
संग संग मनाएँ होली का त्यौहार

मदमस्त हो कर लें खुशियाँ मुठ्ठी में
डूब कर रंगो के तैरते गुबारों में
जला डालें मन की होलिका अब
फैले सौहार्द देश में हमारे अब॥

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