अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.31.2008
एक अनुभूति... मेरी अनुभूति
अरविन्द चौहान

बीस साल पहले की एक छोटी सी घटना ने मेरे मन में एक तीव्र इच्छा के बीज डाले थे। बात सन् १९८८ की बड़ौदा शहर की एक शाम की है जब मै बस में घर को लौट रहा था। बस खचाखच भरी हुई थी और मैं पीछे की एक सीट पर बैठा हुआ था। बीच के एक स्टॉप से एक पुरुष बस के अंदर आया जिसकी गोद में उसकी एक या ड़ेढ़ साल की बेटी थी। बड़ी मुश्किल से उसे खड़े होने की जगह मिल पायी थी। गर्मी व भीड़ से परेशान हो उसकी बेटी ने रोना शुरू कर दिया। उसकी परेशानी देख जाने क्यों मुझ जैसा अविवाहित भी भावविह्वल हो उठा। शायद उसके पिता ने मेरे मन की बात ताड़ ली थी। उसने बेटी को मुझे अपनी गोद में लेने का विनय किया और मैने सहर्ष उसकी बात मान ली।

उसने अपने दोनों बाजू फैलाते हुए मुझे पकड़ लिया था। जाने क्यों वो शान्त हो गई और मेरी छाती से अपना सर टिका कर सो गई। उसके आँसुओं से मेरी कमीज़ भीगी थी और बीच बीच में सिहर कर मुझको और मजबूती से पकड़ लेती थी। मासूम बच्ची का अपनी गोद में अहसास मेरे मन को भीतर तक भिगो गया था। क्या यही होता है शिशु का अहसास... वात्सल्य की धारा मेरे मन में दौड गई थी और मैं एक दैविक क्षण में डूब गया था। न जाने कब बस रुकी और उसके पिता ने मेरा कन्धा थपथपाकर मुझसे अपनी बेटी को वापस माँगा। मेरी तंद्रा भंग हुई और वह अपनी बेटी को लेकर बस से उतर गया। बस मन में बसी रह गई थी एक अनुभूति उस एहसास की।

वक्त गुज़रा शादी हुई बेटा हुआ और व्यस्त जिन्दगी आगे बढ़ने लगी। सब कुछ मिला प्रगाढ़ प्यार करने वाले माता पिता व दो भाई, सुन्दर व कार्यकुशल पत्नी और सुन्दर स्वस्थ व मेधावी बेटा। मगर मन ही मन में एक बेटी की कमी मुझे हमेशा सालती रही। शायद अपनी कोई बहन ना होना एक कारण रहा हो। रह-रह कर बरसों पुराना बस वाला अनुभव मुझे याद आता रहा। सन् २००१ में भवन निर्माण पूरा हुआ जिसमें मेरे माता-पिता पत्नी और मेरे अथक प्रयास व स्नेह का मिश्रण था मानों अपनी बेटी को प्यार दुलार से पाल कर बड़ा किया हो। और अपने इस भवन को ही बेटी मानकर नाम रख दिया अनुभूति।

शायद मेरी इस प्रबल इच्छा से ईश्वर भी पसीज गए और आज मेरी अनुभूति सचमुच में मेरी गोद में है। उसका रोना हँसना किलकारियाँ मन को वैसे ही भिगो जाते हैं जैसे बीस साल पहले किसी और की अनुभूति मुझे भिगो गई थी। हाँ, आज मेरी अनुभूति अपने घर आ गई है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें