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| 09.01.2007 |
| बरसे सावन अब... अरविन्द चौहान |
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बादल उमड़े रिमझिम बरसे बस सावन अब ।
मस्त पवन है चली इतराती सहलाती सब ।। मन मयूर नाच उठा है, झूमें गाएँ सब मद में। जलती धरती को सींचा, जल की इन फुहारों ने।। झरने बहें कलकल उठे गज सब ओर अब । पाखी हर्षाए गगन में चहक मस्ती में सब ।। बगिया में यौवन फूटा, हँसें खिलें फूल खिलखिल। झूले पड़े पेड़ों तले, गोरी झूलें सब मिलमिल।। नहाई धरा करे श्रृंगार पुलकित हो अब । सावन बरसे बाजे मृदंग सा नाचें सब।। घुमड़ घुम्ड़ बादल बरसें, सोंधी सोंधी महक उठी। झूम झूम तरू लहराए, रोम रोम में मस्ती उठी।। बौछारों से हुई तृप्त धरा हर्षाई अब । वसुधा के इस खेल से हुए धन्य जन जन सब ।। |
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