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11.05.2007
 
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ...
अरविन्द चौहान

मन के दीप जले फिर दिवाली आई है ।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

न हो छल विषाद मनों में अब
द्वेश हटा प्रेम मे हों लीन सब
बुराई का विनाश कर अच्छाई छाई है ।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

तिमिर मार रोशन हो जग अब
सब के मन से मिटे कालिमा अब
रावण मार रामजी ने कैसी लीला रचाई है।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

उजला हो मन सब का अब
दीप जला जागो इन्सान अब
सौहार्द औ प्रेम की छटा चहुँ ओर छाई है।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।

मन के दीप जले फिर दिवाली आई है ।
अमावस को हरने फिर दिवाली आई है ।।


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