चीड़ अरुणा घवाना
चीड़ के इन ऊँचे ऊँचे वृक्षों पर इक घोंसले का ख़्वाब देखा, ख़्वाब सपना था या सच पर चीड़ का वह विशाल शाल देखा।
उस ऊँचे शाल से फिर इक भयानक शहर देखा जल रहा था जो कभी आतंकवाद से धर्म के नाम पर आंदोलन की रौ पर ख़्वाब सपना था या सच पर चीड़ का वह विशाल शाल देखा।