अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
12.26.2007
 

अमरबेल
अरुणा घवाना


किसी अमरबेल सी लिपटी
तेरी यादों में ज़िन्दगी
बही जा रही है
है रवानी अब भी बाकी
इसमें जब तक बानगी है
पर सोचता हूँ
कश-दर-कश यादें
क्यों कर सताती हैं
तेरे खामोश नैनों की कोई
कहानी सुनाती हैं
सवाल मेरे माँझी
मेरे मंजर का नहीं
तेरे अहसास-ए-सुकूँ का है
अमरबेल सी लिपटी तेरी यादें।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें