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ISSN 2292-9754

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03.28.2015


 वैश्वीकरण में किसान और बैल : संदर्भ ‘बाज़ार में रामधन’

हिन्दी साहित्य का बड़ा हिस्सा किसान संस्कृति की ओर उदासीन है। विमर्शों के हो-हल्ला में किसान की आह सुनने की फ़ुरसत किसे है! प्रेमचंद के बाद किसान और खेती का संकट कुछेक जनवादी कथाकारों में चित्रित हुआ है। कैलाश बनवासी की बहुचर्चित कहानी ‘बाज़ार में रामधन’ खेती का संकट और बैल के त्रास को उभारती एक बेहतरीन एवं दुर्लभ कहानी है। बैल किसानों के संघर्ष का प्रतीक है। वैश्वीकरण में किसान पर मार पड़ी तो बैल कैसे बचेगा?

रामधन खेतिहर किसान है जिसका बारहवीं पास बेरोज़गार भाई मुन्ना जब हर तरफ़ से हार जाता है तो रामधन से ज़िद्द करता है कि वह बैलों को बेच दे और उससे जो पैसे मिले उससे उसे कोई नया ‘धंधा’ करा दे। यहाँ संकेत है किसान और खेती के विघटन का। मुन्ना पूँजीवाद की गिरफ़्त में है। वह अब खेती नहीं करना चाहता। इसके बजाय वह ‘धंधा’ अर्थात गैर-खेती विकल्प को चुनता है। नवउदारवाद और मुक्त बाज़ार-नीति ने खेती के प्रति विरक्ति पैदा कर दी है। यहाँ ‘धंधा बनाम बैल’ का प्रश्न है क्यूँकि नवउदारवाद ने बैल से बेहतर विकल्प ट्रेक्टर को बना दिया है।

मशीन ने बैलों को बेकार बना दिया है। बैल और किसान का नाता गहरा और अव्याखेय है। रामधन जानता है कि “बैल हमारे घर कि इज्जत हैं ......घर की शोभा हैं और इससे बढ़कर हमारे पिता की धरोहर हैं....उस किसान का भी मान है समाज में जिसके घर एक जोड़ी बैल नहीं।’’ लेकिन विडम्बना यह है कि आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था के आरोहण के हर पग पर किसानों के हित की बली चढ़ाई जाती है, रामधन मुन्ना का मन रखने के लिए नज़दीक के एक कस्बे में लगने वाले पशु-मेले में चला जाता है। रामधन खरीददारों को जानबूझकर मूल्य ज़्यादा बताता है ताकि बैल न बिके। वह बाज़ार जाता बिना भाव गिराए अपने दाम पर टिका रहता और बैलों के न बिकने पर वापस घर आ जाता। इस कहानी में संवेदना तब प्रखर होती है जब अंत में बैल रामधन से पूछते हैं कि “मान लो, अगर दाऊ या महाराज तुम्हें चार हजार दे रहे होतें तो क्या तुम हमें बेच देते?” इस पर होरी की परंपरा का किसान रामधन बड़ी आत्मीयता से कहता है “शायद नहीं, फिर भी नहीं बेचता उनके हाथ तुमको।’’

“बेचना तो पड़ेगा एक दिन!” बैल कहते हैं “आखिर तुम हमें कब तक बचाओगे रामधन! कब तक!”

इस मार्मिक प्रश्न पर रामधन मुस्करा भर देता है...एक बहुत फीकी और उदास मुस्कान, अनिश्चितता से भरी हुई। रामधन जानता है कि वह लाख होशियारी कर ले, उसके बैलों को तो बिकना ही है क्यूँकि बाज़ार का असर व्यापक है। फिर रामधन आशंकापूर्ण शब्दों में बैलों से कहता है, “देखो हो सकता है कि अगली हाट में मुन्ना तुम्हें खरीदकर ले आए।’’ स्पष्ट है कि बैल रामधन के पास रहें न रहें अगली हाट तो ज़रूर लगेगी। हाट या बाज़ार की नीति ऐसी है जिसमें सबकुछ पूँजी के हाथों नियंत्रित होता है। वहाँ सबकुछ माल है या मुनाफ़ा कमाने के लिए, इसलिए किसान और बैल के साथ तनिक रियायत नहीं बरती जाती। बस कसाई की तरह बकरे की गर्दन को हलाल कर दिया जाता है। रामधन बाज़ार की दुनिया से वाकिफ़ है इसलिए बैलों को न बेचने के बावजूद वह बाज़ार से आशंकित है।

वैश्वीकरण में न बैल को तिनका है न किसान को रोटी। 1936 में ‘गोदान’ लिखे जाने को आठ दशक बित गए, न ‘गोदान’ अप्रासंगिक हुआ और न गाय-बैल खरीदने-पालने की आस ही पूरी हो पायी। प्रेमचंद से कैलाश बनवासी तक किसानों की यह दुखद हालत ज़ारी है। अंत में कवि योगेश समदर्शी के शब्दों में-

“बेटा पढ़ लिख कर गया, बन गया वो इंसान
देख उजड़ती फसल को, रोता रहा किसान’’

अरुण प्रसाद रजक
शोधार्थी, कलकत्ता विश्वविद्यालय, मो.- 8100935197


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