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ISSN 2292-9754

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10.03.2014


रहीम : जीवनानुभूति का सच्चा पथिक

हिन्दी नीति-काव्य जगत के अंतर्गत रहीम की अपनी ख़ास पहचान है। नीति-काव्य की महता ही कुछ ऐसी होती है कि इस क्षेत्र में जो आते हैं, उनका झंडा कभी नहीं झुकता। वृंद, गिरधर, बिहारी आदि कवियों ने नीति काव्य-जगत में जो स्थान बनाया, उसे किसी कीमत पर कलुषित नहीं किया जा सकता। फिर भी आ. रामचंद्र शुक्ल अपने "हिन्दी साहित्य के इतिहास" में इन कवियों से आगे का स्थान रहीम को देते हुए कहते हैं "रहीम के दोहे वृंद और गिरधर के पद्यों के समान कोरी नीति के पद्य नहीं है।" रहीम के दोहे की गहराई में जाने से पता चलता है कि उन्होंने नीति काव्य की काया ही बदल दी। यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि उन्होंने सही मायने में जीवन को समझा। रहीम के प्रभाशीलता की थाती को स्वीकार करते हुए आचार्य शुक्ल लिखते हैं- "तुलसी के वचनों के समान रहीम के वचन भी हिन्दी भाषी भू-भाग में सर्वसाधारण के मुँह रहते हैं। इसका कारण है जीवन की सच्ची परिस्थितियों की मार्मिक अनुभव।" आ. शुक्ल की इस टिप्पणी से आगs या कुछ अलग कह पाना कठिन है। कठिन इसलिए कि रहीम की जीवनानुभूति का इतना सही और सच्चा आकलन शायद ही किसी और ने किया हो। जिस तरह तुलसी की कविताएँ जीवन से विमुख नहीं हैं, लोकोन्मुख हैं, जीवन को सुखी और सार्थक बनाने के लिए हैं, उसी तरह रहीम की कविताएँ भी। रहीम भी तुलसी की तरह कठिन जीवन के सहज कवि हैं। सहजता एक नैतिक मूल्य है। वह अपने आप नहीं आती बल्कि समाजिक संघर्षों के बीच पैदा होती है। रहीम की सहजता भी जीवन-संघर्षों से जुड़ी अनोखी कल्पना से उपजी है। रहीम जब कहते हैं - "जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग/चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटें रहत भुजंग॥" तो स्पष्ट कर देते हैं कि उत्तम प्रकृति वालों की बुरी प्रकृति वाले कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। कठिन परिवेश में रहकर भी सहजस्वाभाविक चेतना की चमक कभी समाप्त नहीं होती।

कविता में जीवनबोध का गाढ़ा महत्व होता है। उदात्त जीवनानुभूति के आलोक में ही कवि नैतिकता को ईजाद करता है। जीवन में मित्रता और शत्रुता दोनों भाव ही देखे जाते हैं। कौन मित्र है, और कौन शत्रु, इसकी पहचान तभी होती है, जब मनुष्य प्र विपत्तियाँ आकर पड़ती हैं। उदात्त जीवनानुभव की रोशनी में ही रहीम ने विपत्ति को वरेण्य माना है -

"रहिमन विपदाहू भली, जो थोरे दिन होय ।
हित अनहित या जगत में, जान परैं सब कोय॥"

सज्जनों की मित्रता लाभप्रद ही होती है, हानिप्रद कुछ भी नहीं होती। सज्जनों की मैत्री सायंकालीन वृक्षों की छाया के अनुरूप होती है, जो वर्द्धित ही होती रहती है। ऐसे सज्जनों के रुष्ट हो जाने पर भी उन्हें एक बार नहीं, अनेक बार मनाना चाहिए -

"टूटे सज्जन मनाइये, जो टूटे सो बार ।
रहिमन फिर फिर पोइए, टूटे मुक्ता-हार॥"

सदिच्छा, नैतिक किस्म की शिक्षा या उपदेशपरकता और सरल आशावाद की यहाँ अपनी बानगी है। नैतिक जिम्मेदारी की बोध हरदम और हरेक से नहीं उठाया जाता। बकौल मीर "एक भारी पत्थर है।" नीतिकार के पास सच्चाई को सहने-समझने के लिए समर्पण की कोई कमी नहीं होती। प्रेम की गरिमा और महिमा को समझने वाला ही इतनी खरी-खरी बात कह सकता है कि प्रेम का पथ अगम है, उस पर गमन करनी हँसी-खेल नहीं। यथा -

"रहिमन मैन तुरंग चढ़ि, चालिबो पावक माहिं ।
प्रेम पंथ ऐसा कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं॥"

प्रेम में हृदय की सरलता अपेक्षित है। रहीम में सरलता को समझने के लिए भावुकता अद्वितीय है। आ. शुक्ल लिखते हैं - "अपने उदार ऊँचे हृदय को संसार के वास्तविक व्यवहारों के बीच रखकर जो संवेदना इन्होंने प्राप्त की है उसकी व्यंजना अपने दोहे में की है।" उदात्त भावों से परिपूर्ण होने के कारण ही रहीम सलाह देते हैं कि कभी भी प्रेम को मत तोड़ो। टूटने पर प्रेम या तो फिर जुड़ता ही नहीं है, और यदि जुड़ता है तो वह गांठ-गंठीला हो जाता है -

"रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरहु चटकाय ।
टूटे से फिर ना जुरै, जुरे गांठ परि जाय॥"

यहाँ काव्य-बोध में कल्पना का झूठा खेल नहीं है। सच्ची प्रेमजीवन की झलक है। आ. शुक्ल ठीक ही कहते हैं कि रहीम का हृदय द्रवीभूत होने के लिए कल्पना की ऊँची उड़ान की अपेक्षा नहीं रखता। संसार के सच्चे और प्रत्यक्ष व्यवहारों से तादाकार होने कारण उनकी कविताएँ स्वतः स्फूर्त बन पड़ती हैं। इसलिए काव्य-वस्तु की "प्रोसेसिंग" जैसी जटिल क्रिया सहज-भाव से सम्भव हो पाती है। गरज यह है कि रहीम की कविता में न तो कोई हिकमतगीरी है, न ही किसी तरह की "मैनेरिज़्म"। हाँ, कविता में विरल स्वाभाविकता अवश्य है। इस स्वाभाविकता को परखने के लिए रहीम के निम्न दोहे की तफ़सील ज़रूरी है -

"बड़े बड़ाई ना करैं, बड़ो न बोलैं बोल।
रहीमन हीरा कहैं, लाख टका मेरो मोल॥"

अच्छे और बड़े लोगों का स्वाभाव अहंकारविहीन होता है। वे जीवन में सहज होते हैं। वे अच्छे तथा परोपकार पूर्ण कार्य करके दूसरों को सुख तो पहुँचाते हैं किन्तु अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करते। जिस प्रकार हीरा अपनी बहुमूल्यता का वर्णन स्वयं नहीं करता। रहीम इसी "सादग़ी" के कायल हैं। बड़प्पन की जड़ें अपनी ज़मीन में जितनी गहरी होंगी, उसका आकाश उतना ही समुन्नत होगा। गौरतलब है कि रहीम इसके लिए विपुल शब्द-राशि को नहीं, "ख़ामोशी" को प्रस्तावित करते हैं। इसी को वे "सादग़ी" कहते हैं, जिसके लिए किसी झील की तरह जीवन्त, गहरा और निर्मल होना ज़रूरी है। बात को और साफ करना हो, तो रहीम का यह दोहा हमारी कुछ मदद कर सकता है –

"रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मौती, मानुष, चून॥"

पानी ही जीवन है। इसके बगैर जीवन भावनात्मक इकहरेपन का शिकार हो जाता है। जिस तरह हीरे की ताकत उसकी ख़ामोशी है, उसी तरह मोती का मूल्य उसका पानी है। यहाँ अपनी भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति के लिए रहीम द्वारा "पानी" जैसे सही शब्द की खोज ही शायद सबसे बड़ी खोज है। पानी या सादग़ी के उबरने पर मोती और मानुष मूल्यहीन हो जाते हैं। कवि इस गोपन आशय को कैसे प्रत्यक्ष करता है और कितनी सच्चाई और संजीदगी से कितने बड़े कैनवास पर उनका प्रतिकार कर सकता है, उपर्युक्त दोहा इसका ही इम्तिहान है। यह इसपर निर्भर है कि उसका अनुभव कितना वास्तविक और विविध है, सत्य से इसका साक्षात्कार कितना मार्मिक है। रहीम का सबसे बड़ा वैशिष्टय है – सच्ची अनुभूति को सहज-सरल आम लोगों की बोली में कहना। यही कारण है कि उनके दोहे ज़िन्दगी का सच उगलने में सक्षम हैं और जन-जन के प्यारे हैं। रहीम के इसी दम-ख़म के लिए आ. शुक्ल को कहना पड़ा – "उनमें मार्मिकता है, उनके भीतर से एक सच्चा हृदय झाँक रहा है। जीवन कि सच्ची परिस्थितियों के मार्मिक रूप को ग्रहण करने की क्षमता जिस कवि में होगी वही जनता का प्यारा कवि होगा।

अरुण प्रसाद रजक
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, कलकता विश्वविद्यालय व अतिथि प्रवक्ता, विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर
aunajak30@gmail.com


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