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10.22.2007
 
परम विश्व का परम विराट
अरुण कुमार प्रसाद

चाँद अँधेरा चीरकर आ गया फिर मेरे आँगन में।
वैसी प्रेम-प्रतीक्षा करता, रहा अकिंचन सावन में।
बरसा नभ हर सावन में टूट-टूट मेरे आँगन में।
बूँद-बूँद बन प्रेम गया पर कहाँ रहे तुम सावन में?

गहरी पीड़ा बुनकर तुमने हृदय हमारा खाक किया।
हमने किन्तु, खाक से साजन गहरे मन से याद किया।
खाक की राखें आँसू में घुल सागर के है पास चलीं।
इस आँगन से शुभ्र ठिकाने पाने को बेबाक चली।

यादें पर नहीं मिट पायेंगी प्रेम की यह ऐसी सौगात।
याद करेंगी उज्जवल मन से जन्म जन्म तक पूरे सात।
प्रेम प्रभु का विशद रूप व उसके मन का प्रकट स्वरूप।
अनुपम में भी रहकर किन्तु, भूलेगा नहीं तेरा रूप।

हर बसंत उस परम विश्व के आयेंगे जाना तुम आ।
इन आँखों से अवलोकन कर कर लूँगा फीकी पीड़ा।
परम विश्व में भी तपस्या करके तुमको लूँगा माँग।
इसी मिलन से मुक्ति होगी और मिलेगा परम विराट।

अतः चाँद की ही भाँति मेरे मन के घर में आ सिमटो।
सप्तर्षि से अमर सुहागिन होने के वर से आ, न हटो।
उस विराट को यहीं बुलाकर परिभाषा कह दें विराट।
वह विराट नहीं है ब्रह्माँड में सदा प्रेम ही रहा विराट।


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