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07.02.2014


भारत की बेटियाँ

क्या मैं बेटी हूँ इसलिए
तुम मुझे हर उस गलती का ज़िम्मेदार ठहरा सकते हो
जो कभी मैंने की ही नहीं।

क्या मैं बेटी हूँ इसलिए
तुम अपनी सारी मुसीबतों की जड़
मुझे बता सकते हो।

क्या मैं बेटी हूँ इसलिए
मुझ पर पाबंदियाँ लगाकर
मुझे चौके - चूल्हे तक सीमित रख सकते हो।

क्या मैं बेटी हूँ इसलिए
मुझसे सपने देखने का अधिकार भी
तुम छीन सकते हो।

क्या मैं बेटी हूँ इसलिए
अपने पुरुषत्व से तुम मेरे अस्तित्व को
जब चाहे कुचल सकते हो?

या फिर मैं बेटी हूँ इसलिए
तुम्हे डर है समाज का,
लोक, परम्परा का,
रीति - रिवाज़ का।
पर शायद तुम भूल रहे हो
की इस समाज की रचना हमसे ही हुई है।
हम हैं तो स्नेह, दुलार, उल्लास - उमंग
धरती पर अब भी कायम है।

हम ही ममता की प्रतिमूर्ति हैं
हमसे करुणा का संचार है,
हम ही एक बहन का आशीर्वाद
हम ही पत्नी का त्याग हैं।

हम ही तुम्हारे हमसफ़र
हम ही हमराज़ हैं,
तुम्हारे अंतर्मन की शक्ति बन
हम मुश्किलों से लड़ते हैं,
तुम्हारा हौसला, गरूर बन
हम बुलंदियों को छूते हैं।

इसलिए मत कोसो
हमें मत बाँधो, मत जकड़ो,
मसलो मत हमें,
खुल कर जीने दो,
अपनी मंज़िल को छूने दो हमें।

हम भारत की बेटियाँ हैं
वह सबकुछ कर दिखलाएँगे,
चाहे देश की सीमा हो
या अंतरिक्ष की ऊँचाई,
मत रोको, मत टोको
मत कोख में मिटने दो हमें,
बेटों के साथ कदम, दर कदम
चलने दो हमें,
अपनी मंज़िल छूने दो।


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