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05.15.2014


अफ़सोस

इस शहर के कोलाहल में,
अपनी ही दिल की बात
न सुन पा सकने का अफ़सोस।

बहुमंज़िली इमारतों के बीच
अपनी वास्तविक मंज़िल के
गुमशुदा हो जाने का अफ़सोस।

आदमियों की भीड़ में,
इंसान की इंसानियत के
खो जाने का अफ़सोस।

कई मुखौटों के बीच
अपनी ही शख़्सियत के
मिट जाने का अफ़सोस।

सफलता की बढ़ती चाहतों में,
तुम्हारी चाहत को
न स्वीकार पाने का अफ़सोस।

और तुम्हारी आँखों की गहराइयों में छिपे
प्यार के इकरार को
न ढूँढ पा सकने का अफ़सोस -
मुझे हमेशा रहेगा.......।


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