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ISSN 2292-9754

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02.13.2016


शिप्रा नदी

मध्य भारत में स्थित मध्यप्रदेश में कई नदियों का उद्गम स्थल है, जिनमें शिप्रा एक है। शिप्रा का अर्थ है 'तेज़ गति से बहने वाली'। शिप्रा नदी को मध्यप्रदेश की गंगा कहा जाता है। स्थानीय भाषा में इसे 'क्षिप्रा' भी कहा जाता है। शिप्रा नदी विंध्याचल की श्रेणियों में 'कोकरी टेकड़ी' पहाड़ियों से 747 मीटर (2456 फीट) की ऊँचाई से निकलती है। इसकी कुल लंबाई 195 किलोमीटर है, जिसमें 93 किलोमीटर यह उज्जैन से होकर बहती है।

शिप्रा उज्जैन की मुख्य नदी है। उज्जैन पवित्र तीर्थ नगरी है। यहाँ की यात्रा शिप्रा में स्नान के बिना पूरी नहीं समझी जाती है। शिप्रा नदी की प्रतिदिन भव्य आरती होती है। शिप्रा के तट पर प्रत्येक बारह वर्षों बाद कुंभ मेले का आयोजन होता है। उस समय यहाँ भारी भीड़ एकत्रित होती है।

पहले शिप्रा में बहुत पानी था। अब सिर्फ मानसून के महीनों में ही इसमें अधिक पानी रहता है। उज्जैन के त्रिवेणी घाट से शिप्रा नदी शहर में प्रवेश करती है। यहीं 'खान' नदी इसमें मिलती है। कालिया देह नामक स्थान पर शिप्रा उज्जैन को छोड़ देती है। दक्षिण दिशा में बहते हुए मालवा का पठार पार कर रतलाम और मंदसौर शहरों को छूते हुए शिप्रा चंबल नदी में मिल जाती है।

उज्जैन नगरी को प्राचीन समय में अवती, अवन्तिका, अवन्तिकापुरी, उज्जयिनी और उज्जैन कहा जाता था। उज्जैन को खगोल गणनाओं के लिए पुरातन समय में एक उपयुक्त स्थान माना जाता था। कर्क रेखा इसी शहर से होकर गुज़रती है, जिसे 'ट्रोपिक आफ कैंसर' कहते हैं। उज्जैन में एक समय समय संस्कृत और ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करने दूर-दूर से विद्यार्थी आते थे। भारत के महान विद्वान ब्रह्मगुप्त व भास्कराचार्य उज्जैन नगरी के रत्न थे। महाकवि कालिदास और ऐतिहासिक राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य उज्जैन नगरी से सम्बन्धित थे।

शिप्रा नदी के तट पर स्थित मंदिरों में मुख्य मंदिर महाकाल का है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। शिप्रा के किनारे अनेकों मंदिर हैं। यहाँ नाथ सम्प्रदाय के महान गुरु मत्स्येन्द्रनाथ की समाधि है, जो गोरखनाथ जी के गुरु थे। शिप्रा के किनारे ही ॠषि संदीपन का आश्रम था, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण और बलराम पढ़ते थे। यहीं सुदामा से श्रीकृष्ण की भेंट हुई और सुदामा उनके परम मित्र बने थे। शिप्रा के तट पर स्थित मंदिरों से अनेकों पौराणिक मान्यताएँ जुड़ी हैं।

उज्जैन प्राचीन व पवित्र नगरी है और शिप्रा में स्नान करने का बड़ा महत्व है, लेकिन आज शिप्रा का पानी स्नान करने लायक भी नहीं है। इसके पानी के प्रदूषण की मुख्य वज़ह इसमें मिलने वाली 'खान' नदी है, जो इन्दौर से घरेलु और औद्योगिक अपशिष्ट युक्त पानी लाती है। इन्दौर में सैकड़ों उद्योग हैं, जो अपना प्रदूषित जल खान नदी में बहाते हैं। भाषाविद् बताते हैं कि खान नदी का नाम पहले कृष्णा या कान्हा हुआ करता था लेकिन बाद में कान्ह ही रह गया, इसे भी लोगों ने बोलते-बोलते खान कर दिया। पिछले 30-40 वर्षों में यह नदी गंदले नाले में बदल गयी है। शिप्रा नदी के तट पर अप्रैल माह 2016 में लगने वाले सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए खान नदी का पानी शिप्रा में मिलने से रोकने की योजना मध्य प्रदेश सरकार ने बनाई है। खान नदी का पानी खेती व पीने के योग्य तो है ही नहीं, मवेशियों के लिए भी हानिकारक है। इससे आस-पास का भू-जल भी प्रदूषित हो चुका है। लोगों को जागरूक किया जा रहा है कि इस नदी के पानी का उपयोग सिर्फ़ फूलों की खेती के लिए करें, अन्य किसी कार्य के लिए नहीं।

शिप्रा नदी में उज्जैन शहर के कई गंदे नाले भी गिरते हैं। मानसून में नदी में पानी का बहाव बढ़ने से जल की गुणवत्ता कुछ बेहतर होती है, लेकिन अन्य महीनों में जल की दशा दयनीय होती है। लगातार बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिकरण ने हमारी नदियों व उनकी सहायक नदियों को बरबाद कर दिया है। बिना उपचारित किए हुए सीवेज को नदियों में बहाने और औद्योगिक इकाइयों का विषैला रसायनयुक्त पानी नदियों में बहाना ही नदियों के प्रदूषण का मुख्य कारण है। शिप्रा में मछलियों के मरने की कई घटनाएँ हो चुकी हैं। समस्त जलचरों के प्राण संकट में हैं।

पवित्र नदियाँ यदि प्रदूषित हो गईं तो उनके किनारे बसे तीर्थों का महत्व भी कम हो जाएगा। आज हालात यह है कि तीर्थयात्रा पर सबसे अधिक पानी खरीदने का खर्चा हो गया है, जबकि प्रत्येक तीर्थ पानी के स्रोत के पास ही स्थित होता है। हम सबका दायित्व है कि हम अपनी नदियों को बचाएँ। हमें प्लास्टिक के पैकेट में बंद पूजन सामग्री का नदियों में विसर्जन करना भी रोकना होगा। कम से कम इतना कार्य तो प्रत्येक पर्यटक अपने स्तर पर कर ही सकता है।


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