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ISSN 2292-9754

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09.05.2017


हिन्दी माँ

आधुनिकता के गलियारों में
तरक़्क़ी की सीढ़ी के नीचे
बदहवास बैठी हिन्दी माँ
आँखों से छलकता दर्द
चेहरे से विस्मय, अवसाद
तरक़्क़ी की सीढ़ियों पर चढ़ते
उसके बेटे
उसे साथ ले जाना भूल गये हैं।

एकांत बैठी हिंदी माँ सिसकती
अपनी दशा पर हँस
क़िस्मत को कोस रही है
वक़्त की बिसात पर
मोहरा बनी हिन्दी माँ।

हिन्दी माँ जिसने हमें बोली दी
रस दिए, भाव दिए
कविता बनी शृंगार की
जब हम प्रेमी बने
कविता बनी करुणा की
जब रिश्ते हमारे टूटे
हास्य रस का पान करा
हँसना हमें सिखाया
वीभत्स रस से परिचय करवा
गले हमें लगाया।

माँ को भूले बेटे
किसी और माँ की आँचल में
जाकर सो रहे हैं
और हमारी हिन्दी माँ
बेजान बुत सी
चीख रही, पुकार रही
कह रही
लौट आओ मेरे बच्चो मेरे पास
ले चलो मुझे भी अपने साथ


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