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ISSN 2292-9754

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03.19.2016


पुरुषवादी मानसिकता का बर्बर रूप

पिछले दिनों महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शनि मंदिर में प्रवेश को लेकर आन्दोलनकारियों और मंदिर समिति की तमाम कार्यवाहियाँ हमारे सामने आ चुकी हैं। इन सबके बावजूद स्त्री-विमर्श के पैरोकार, लेखक-बुद्धिजीवी, कानूनविद और यहाँ तक कि समाजशास्त्री भी इस घटना को भिन्न-भिन्न तरीक़े से देख रहे हैं किन्तु इसके कुछ पहलुओं को जानबूझ कर दरकिनार किया जा रहा है।

कुछ लोग भारतीय परम्पराओं का हवाला देकर स्त्री जाति को अपवित्र और कलंकित कर रहे हैं तो वहीँ दूसरी तरफ़ कुछ लोग मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के विषय को समाज में अंधविश्वास की तरफ़ ले जाने की कार्यवाही मान रहे हैं। हद तो तब हो गयी जब कुछ लोग इस मामले को मात्र मंदिर में प्रवेश और रजोधर्म तक ही सीमित करके अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं। भारतीय राज्य व्यवस्था पर विश्वास करने वाले तो संविधान और क़ानूनी दांवपेंच तक ही सिमट कर रह गए हैं जो इस बात का संकेत है कि इस तरह का विमर्श पुरुषवादी मानसिकता और लैंगिक पूर्वाग्रह से ग्रसित है जिसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।

यह इस तरह का अकेला मुद्दा नहीं है क्योंकि सबसे ज़्यादा प्रगतिशील कहे जाने वाले राज्य केरल में तो पिछले 20 वर्षों से महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का आन्दोलन चल रहा है। जबकि उस राज्य में सबसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी महिलाएँ हैं। मैं इस मुद्दे के बहाने आप लोगों बात कर रही हूँ कि हमने एक ऐसा मौक़ा गँवा दिया जो लोगों की चेतना को उन्नत कर सकता था।

दोस्तो मामला सिर्फ़ अपवित्र महिलाओं को मंदिर-प्रवेश से वंचित रखने तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें बहुत गहराई तक हमारे समाज और मन मस्तिष्क में पैठ बनाये हुए हैं। ज़रा ग़ौर कीजिए महिलाओं के प्रति यह भेदभाव किसी विशेष जाति धर्म से जुड़ा हुआ नहीं क्योंकि मुस्लिम महिलाओं का मस्जिद में प्रवेश वर्जित है। इसी तरह चर्च में भी पुरुषों का ही वर्चस्व है।

किसी भी धर्म में एक भी गाली पुरुषों पर नहीं है। सभी महिलाओं पर आधारित हैं। आज भी अपमान का बदला लेने के लिए महिलाओं को ही शिकार बनाया जाता है। स्त्रियों पर ही तेज़ाब डाले जाते हैं। आज भी वंचितों में वंचित स्त्री समुदाय ही है। मुझे उन लोगों से सख़्त नफ़रत है जो कुल मिलकर दोषी महिलाओं को ठहरा रहे हैं। उनके लेखन में, राज्य व्यवस्था, पितृ सत्ता है या पुरुष समाज द्वारा महिलाओं को अपवित्र और नीचा दिखाने वाली संरक्षित भेदभाव वाली परम्पराओं को तोड़ने की तड़प नहीं दिख रही।

दोस्तो, यह घटना पुरुषवादी मानसिकता के बर्बर रूप को हमारे सामने लाती है कि स्त्री दमन, उत्पीड़न और शोषण के लिए ही है। यह घटना इस बात का इशारा कर रही है कि स्त्रियाँ हमेशा से पुरुषों के अधीन रही हैं और आज भी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक शक्तियों के तमाम साधन-साध्य पुरुषों के अधिकार में हैं। वे जब चाहे महिलाओं को उनकी औक़ात दिखा सकते हैं।

इस घटना ने वर्तमान व्यवस्था पर पुरुष प्रधान मानसिकता की व्यापकता को हमारे सामने रख दिया जो महिलाओं के आर्थिक-शोषण, उत्पीड़न और सामाजिक दमन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका निभाता है। यही वो मानसिकता है जो महिलाओं को रोकती है, यही मानसिकता प्यार करने से रोकती है, सृजन करने से रोकती है, फ़तवों के ज़रिये रोकती है और एक मुकम्मल जहां बनाने से रोकती है। हमें ऐसी मानसिकता को बदलने की ज़रूरत है।


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