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ISSN 2292-9754

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02.18.2017


नूतन आशियाँ

बारिश से बचने की कोशिश में
कपोत छज्जे पर आती थी।
धूप में रखे सरसों व चावल
चिड़िया चुगकर उड़ जाती थी।

अमिया पर बैठ आँगन में
काली कोयल गाया करती थी।
बाहर बगीचे में मधुकर भी
गुनगुन शोर मचाता था।

पर कहाँ गई वृक्षों की टहनियाँ?
काँव-काँव का स्वर अब कहाँ?
ईंट की दीवारें हैं अब दिखती
ईमारतें ही ईमारतें हैं यहाँ वहाँ।

भयभीत है वृंद सारे, उड़ चले
खोजने अपना नूतन आशियाँ।


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