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ISSN 2292-9754

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02.18.2017


अनमोल रतन

हम हैं धरती के अनमोल रतन
पहचाने कहाँ हर किसी का मन?

घर-बगिया की किलकारी हमसे
पापा-मम्मी की फुलवारी हमसे।

खेल न पाते गेंद उछाल,
पड़ती बड़े-बड़ों की फटकार

तुम बहुत हो शोर मचाते।
कहते - हम उन्हें हैं भाते।
फिर क्यों हमें हैं वे भगाते?

हम बच्चों ने किया विचार
चलो अब अंबर तारों के संसार।

जहाँ न होगी कोई दीवार,
दामन ख़ुशियों से होगा निहाल।


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