| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 09.19.2008 |
|
कभी कान्धा भीगा है आपका |
|
कभी
कान्धा भीगा है आपका?
यूँ तो हम सब दिल भिगोते हैं,
कभी कभी आँखें भी भीगती हैं,
ये
सब
'अपने'
गम
की निशानी हैं।
लेकिन भीगा कान्धा,
एक
प्रतीक है,
एक
सहेली या दोस्त के दुःख का।
किसी मित्र को आपकी ज़रूरत होती है तभी भीगता है आपका कान्धा।
मेरी एक
सहेली है,
बचपन की।
चलो मैं उसका नामकरण करती हूँ- "सोनी"।
सोनी आज के समाज की नारी की एक मिसाल है।
माता-पिता को जिस बेटी के कैरियर पर नाज़ हो,
ऐसी है मेरी सोनी।
जब
वह बिजिनेस प्रेजेंटेशन करती है,
तो
कभी कोई उसकी कही बात पर ना नहीं कर सकता,
कभी नहीं।
अमरीका में आकर एक हिन्दुस्तानी लड़की,
वो
भी अकेली,
इतने रौब से सत्ता बनाए रह रही है,
नाज़ की बात है।
सोनी
हफ्ते के सभी दिन जी भर के काम करती है।
दिन क्या अरे! वो तो रात-रात भर काम करती है।
अपने काम में बहुत उसकी बहुत निष्ठा है।
और
हमेशा रहती; अगर उसकी मुलाक़ात
'डब्बा'
से
नहीं होती।
हाँ बस यही नाम उस जनाब को सही सूट करता है।
वैसे तो उन महाशय का एक भला सा नाम भी है लेकिन मेरा दिया गया ये नाम उनको
बिल्कुल सही बैठता है।
हाँ,
तो
हमारे ये डब्बा जी भी एक जानी-मानी हस्ती हैं और तिस पर शादी-शुदा भी हैं।
लेकिन अपने यौवन का रंग और प्रभाव घर से बाहर ज़माने में आज़माने में पीछे
नहीं रहते और दुर्भाग्यवश इस का शिकार बनी मेरी दोस्त!
जाने कैसा
वक्त है आजकल।
कहते हैं,
इश्क़ कभी किया नहीं जाता,
हो
जाता है,
पर
ऐसा भी क्या इश्क़ जिसे नहीं होना चाहिए और फिर भी हो।
सही बात की पैरवी नहीं करनी पड़ती और गलती की कोई सफाई चलती नहीं।
है
न?
मैं इसी
बात से खुश थी की सोनी खुश है.... बहुत खुश ... चाहे वो खुशी उधार की हो!
पर हर
उधारी की कीमत होती है,
मूल के साथ सूद भी चुकाना पड़ता है।
सोनी को शायद पता नहीं था।
अब फास्ट
फॉरवर्ड आज तक....
शुक्र की
शाम थी।
लोग वीकेंड के स्वागत में लगे थे! अभी मैं आरती का दिया लगा ही रही थी की
फ़ोन बजा घननन ....
"हाय!
आर्ची,
आज
ना बहुत ही सही सेटिंग है,
तू
जल्दी एवलोन आजा! बहुत मज़े करेंगे! बिल्कुल हॉस्टल जैसी मस्ती करेंगे।
"
सोनी बहुत ही ज़्यादा उत्तेजित लग रही थी,
स्वाभाविक रूप से भी ज़्यादा!
"अरे
नहीं यार! अभी तो आरती भी नहीं हुई है,
खाना बनाकर,
बच्चों को खिलाकर,
उन्हें सुलाना है।
और
मम्मी बाउजी का भी देखना है! यू केरी ऑन! फिर कभी!
"आर्ची
प्रोमिस ड्रिंक नहीं करेंगे,
मुझे पता है तुम नहीं करती पर तुम्हें डांस अच्छा लगता है न,
आज
यहाँ बॉलीवुड नाईट है! खूब डांस करेंगे पुराने दिनों जैसे,
पूरी रात ...बिंदास,
तुम अपना काम ख़तम करके आ जाना,
साउंड्स लाइक अ प्लान,
हाँ?"
सोनी जब कहती है तो हमेशा बड़े अधिकार से कहती है।
"नहीं
रे! मुझे तीन दिन से बुखार है,
आज
रेस्ट करना चाहती हूँ।" मैंने कहा क्योंकि घर और ऑफिस के काम में मुझे कतई
आराम नहीं मिल पाया था और बुखार से अभी पूरी तरह उठी नहीं थी मैं।
"आर्ची!
यू सक,
भाड़ में जाओ!" सोनी की आवाज़ में एक अजीब सी झुँझुलाहट थी,
यूँ तो दफा होने को कहा उसने पर जाने क्यों लगा की बुला रही है,
कुछ कहना चाहती है पर कह नहीं पा रही।
शायद इस बात को कोई विश्वास न करे पर कई बार मुझे लगता है जैसे मैं लोगों
के मन की बात सुन सकती हूँ,
सबकी नहीं पर जो मेरे नज़दीक हैं,
दिल के करीब हैं उनकी एक-एक बात सुनाई देती है,
उनके बिना कहे! पता नहीं कैसे और जाने ये अच्छा है भी या नहीं,
कभी कभी बहुत कष्टप्रद होता है दिल की सुन पाना या सुन लेना!
सोनी की
आवाज़ गूँजती ही रही,
सब
काम हो गया घर का,
पर
वो आवाज़ गई नहीं! सन फ्रांसिस्को होता तो शायद मैं नहीं जाती पर एवलोन तो
घर के पास ही था,
सांता क्लारा का एक ही तो डांस क्लब है।
मैंने सोचा मुझे उस से मिलना चाहिए पर अब रात के ग्यारह बजे,
पता नहीं वो वहाँ पर अब तक होगी भी या नहीं।
उसके सेल
फ़ोन का नम्बर मिलाया,
पर
लगा नहीं।
शायद शोर गुल में सुनाई नहीं दिया होगा।
दुविधा
में थी।
कभी डांस क्लब देखा नहीं था।
पता नहीं था की उसमे अन्दर कैसे जाते हैं।
पर
जाने वो पुकार कैसी थी की बस इतना ही याद है की मैं उठी,
गाड़ी शुरू की और एवलोन के बाहर मैं कार से उतरी।
लॉऊँज में बड़े अजीब तरह के लोग मिले।
मन
किया वापस भाग जाऊँ।
दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था की मैं उसे सुन पा रही थी।
मैं सोच रही थी मैं यहाँ क्यों आई हूँ - किसी को पूछा भी नहीं घर में - न
इनको,
न
मम्मी- बाउजी को।
पर
मुझे पता था की अगर मैं पूछती तो कभी आ नहीं पाती,
कोई अनुमति नहीं देते! और मुझे आना था,
किसी को मेरी ज़रूरत थी ... शायद ..
जाने और
क्या-क्या देखना पड़ता अगर एक परिचित नहीं मिल जाते! उन्हें देख कर पहले
मैंने सोचा अरे बाप रे! ये यहाँ! चलो मैं कहीं छुप जाऊँ लेकिन फिर मैंने
सोचा की कम से कम इन्हें मुझसे ज़्यादा ज्ञान होगा।
अरे,
ये
तो सोनी को भी पहचानते हैं,
शायद उसे ढूँढने में मेरी मदद करेंगे।
वैसे तो
इनका नाम हरी है पर अमरीकी अंदाज़ में इन्होंने इसे "हैरी" कर दिया है।
क्यों न करें?
अरे भाई जब संस्कार,
रूप और दिनचर्या ही ढल गई है तो नाम क्या बड़ी चीज़ है?
"हाय
हैरी! हाउ आर यू?
"
इस माहौल में मैं उन से किस तरह बात शुरू करुँ,
समझ नहीं पा रही थी।
“अर्चना!
वाट ऐ सर्प्राइस! तुम यहाँ,
तुम्हारी तबियत तो ठीक है?
घर
में कोई झगड़ा हुआ है क्या?”
उसने बड़े
आश्चर्य अंदाज़ से पहले मुझे देखा फिर मेरे सलवार कमीज को,
जैसे कह रहा हो कम से कम कपड़े तो जगह देख कर पहना करो!
"अरे
नहीं,
वो
दरअसल... एक्च्युल्ली ....मैं सोनिका गिल को ढूँढ रही थी", मैंने हकलाते
हुए कहा।
"ओह
सन्नी बेबी! अच्छा मैं तुम्हे ले चलता हूँ उसके पास।“
फिर
उसने मेरा हाथ पकड़ा और तेज़ी से एक तरफ़ चल पड़ा।
आम
समय में उस से हाथ छुड़ाकर उसको एक तमाचा देना मेरा पहला ख्याल होता लेकिन
कहते हैं औरत की एक अतीन्द्रीय अनुभूति
होती है।
किसी की नियत समझने में सिर्फ़ एक नज़र ही काफ़ी होती है।
बन्दा तेज़ था पर शरीफ़ था तो मैं चुपचाप उसका हाथ थामे उसके पीछे चल ली।
जैसे ही अन्दर प्रविष्ट हुए,
बहुत ही तेज़ संगीत ने कान फाड़ दिए! और गाना भी क्या सही गाना था -
पप्पू के
पास है
MBA,
करता है फ्रांस में होलीडे!
....वादों
की घड़ी हाथों में,
परफ्यूम गुची वाला,
पर पप्पू
कैंट डांस साला ...
पप्पू नाच
नहीं सकता ...
कई लोग -
भारतीय,
गोरे,
काले सभी अपने-अपने ग्रुप में नाच रहे थे।
मैंने सोचा था सोनी भी शायद ऐसे ही किसी टोली में होगी।
पर
सोनी ड्रिंक बार में बैठी थी -अकेली,
पसीने से लथपथ,
शायद मेरे आने से पहले ही बहुत डांस हो चुका था।
टकीला के कई खाली गिलास सामने रखे थे।
उसके कपड़े देख कर मैं हैरान थी की इतना भी पहनने की क्या ज़रूरत थी?
इसे भी उतार देती,
हू
कयेर्स अनिवे! देखते ही वो खड़ी हो गई उसी तरह जैसे बचपन में मैंने उसकी
चोरी पकड़ ली हो और वो जल्दी से यह सोच रही हों की क्या बहाना बनाए?
मुझे कोई
बहाना नहीं चाहिए था,
मुझे सोनी चाहिए थी और चाहिए थी उसकी खुशी।
"सोनी,
एक
बात करनी है,
बाहर आओ।" मैंने धीरे से कहा,
पता नहीं क्यों मैं सोनी की तरह अधिकार से नहीं कह पाती हूँ।
पर बिना
कुछ पूछे वो बाहर चल दी,
मेरे साथ!
पर अब
ध्यान आया की क्या पूछूँ?
कैसे पूछूँ?
उसने तो कुछ कहा नहीं था।
बात शुरू कैसे हो?
"कैसी
हो तुम?"
बहुत ही बोरिंग तरीके से बात शुरू की मैंने।
और
कुछ सूझा ही नहीं।
"ज़्यादा
बनने की ज़रूरत नहीं है।
तुम ये देखने आई हो की सोनी मर तो नहीं गई।
मैं तुम्हे अच्छे से पहचानती हूँ|
यू
आर सच अ शो ऑफ़।
तुमने मेरे ब्रेक-अप की ख़बर सुनी है और मुझे सुनाने आई हो।
जस्ट गो टू हेल,
लीव मी आलोन," उसने बात शुरू कि इतने भयंकर निनाद से की मेरे आँखों में
आँसू आते आते रुक गए।
"नहीं
सोनी,
मुझे तुम्हारे ब्रेक अप के बारे में पता नहीं था,
प्रोमिस!" मैंने कहा।
कहते हुए मैं अपनी कार में बैठ गई और फिर वो भी कुछ देर में मेरे पास आ गई
जैसे जानती हो कि मैं वहाँ आऊँगी,
जैसे उसे बस इंतज़ार ही था।
फिर भी
हिम्मत करके मैं बोली - "चलो,
छोड़ो! अच्छा बताओ तुमने कोई नया गाना सुना है,
याद है जब हम एक ही रूम में रहते थे और पढ़ाई करके जब थक जाते थे तब सॉफ्ट
म्यूजिक चला कर उसे सुनते-सुनते सो जाते थे,
कितने अच्छे दिन थे न,
है
न?”
मैंने
उसे शांत करने के उद्देश्य से बात को बदलना चाहा।
फिर उसके
उत्तर को सुनने से पहले ही मैंने सी डी
प्लेयर ऑन कर दिया।
उमराव जान के ग़ज़ल चल रहे था।
हम दोनों
चुप बैठे थे और गाना बस गाना चल रहा था।
पता नहीं वह क्या सोच रही थी पर चुप थी!
कब मिली
थी,
कहाँ बिछड़ी थी,
हमें याद नहीं,
ज़िन्दगी
तुझको तो बस ख़्वाबब में देखा हमने,
जुस्तजू
जिसकी थी,
उसको तो न पाया हमने,
इस बहाने
से मगर देख ली दुनिया हमने ...
ए अदा और
क्या सुनाएँ हाल अपना,
उम्र का
लंबा सफर तय किया तनहा हमने ...
मुझे लगा
की इस तरह के गीत उसे और दुखी करेंगे।
मैंने सी डी
बदल दी।
पता नहीं कौन सा था।
शायद नए गीतों का एक कोल्लेक्शन था।
एक
गीत बहुत ही सुंदर था उसमे - पता नहीं किस मूवी का है पर अच्छा लगता है
सुनने में।
हम
जब चुपचाप साथ बैठे थे,
बस
हम दोनों,
उस
रात कार में ... बाहर बहुत अँधेरा था .. एक गीत ख़तम हुआ और वो गीत
आया.....पता नहीं उस रात इतनी चुप्पी कैसे थी?
कोई आवाज़ नहीं थी,
बस
वे शब्द -
कहीं तो,
होगी वो,
दुनिया - जहाँ तू मेरे साथ है,
जहाँ मैं,
जहाँ तू,
और
जहाँ,
बस
तेरे-मेरे जज्बात हैं!
मुझे लगा,
सोनी के गले में कोई आवाज़ रुक सी गई।
मैं कुछ सुनना चाहती थी।
कुछ भी,
मुझे लगा कि उसका बोलना ज़रूरी है वरना वो,
सोनी,अपने
ही बोझ से दब जायेगी।
जाने ना
कहाँ वो दुनिया है,
जाने ना वो है भी या नहीं!
जहाँ मेरी
ज़िन्दगी मुझसे,
इतनी खफा नहीं ..
जैसे ही
मैंने नज़र उठाई सोनी की ओर,
उस
की आँखों में कुछ चमकता हुआ दिखा।
कार में अँधेरा था।
पर
अब एक अजीब सी नजदीकी सी आ गई थी,
मुझे लगा वो मेरे पास है,
बहुत पास।
फिर मेरे कंधों को जैसे किसी ने छुआ।
देखा तो सोनी का झुका हुआ चेहरा था मेरे कन्धों पर था और जाने क्यों मेरा
कंधा भीग रहा था।
पहले लगा उसे रोकूँ,
समझाऊँ पर फिर लगा नहीं इसे बहने देना चाहिए,
ये
आँसू भी एक तरह के मैल होते हैं,
अगर निकाले नहीं जाते तो जमते रहते हैं,
और
जाने कब तक डेरा जमाये रहते हैं,
इनका बाहर निकल जाना ही अच्छा है।
गाना बजता
रहा,
सोनी रोती रही,
मैं चुप रही और कंधा भीगता रहा।
सन्नाटा
था,
जाने अन्दर चल रही इतनी तेज़ चीख बाहर तक क्यों नहीं पहुँच रही थी। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|