अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
04.19.2015


इश्क़ कभी भी लफ़्ज़ों का

नर्मी है एहसासों की, आवाज़ नहीं है
इश्क़ कभी भी लफ़्ज़ों का मोहताज़ नहीं है

प्रीत सजे जब रंगों में
मोनालीसा मुस्काये
प्रीत सजे जब पत्थर पर तो
खजुराहो कहलाये
बिना प्यार के ताजमहल भी ताज़ नहीं है
इश्क़ कभी भी लफ़्ज़ों का मोहताज़ नहीं है

ख़ामोशी में हूक प्यार की
कितना शोर मचाये
गीत-ग़ज़ल मैं लिखूँ डायरी
मेरी भर-भर जाये
क्या होगा अंजाम, पता आग़ाज़ नहीं है
इश्क़ कभी भी लफ़्ज़ों का मोहताज़ नहीं है

होंठ नहीं खुलते नैनों से
बातचीत हो जाये
डर है कुछ कह दूँ तो शायद
प्यार कहीं खो जाये
वैसे बिन बोले भी हम में कोई राज़ नहीं है
इश्क़ कभी भी लफ़्ज़ों का मोहताज़ नहीं है


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें