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ISSN 2292-9754

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04.19.2015


दर्पण हूँ मैं

प्रेम-प्यार ही समझ न मुझको पूर्ण समर्पण हूँ मैं
तू जो चाहे वही दिखाऊँ ऐसा दर्पण हूँ मैं

आँखों-आँखों बतियाऊँ मैं
भाषा से क्या लेना
मन की कहती-सुनती मन पर
कोई ज़ोर चले ना
तेरी चाहत यों तड़पाये, लगता तड़पन हूँ मैं
तू जो चाहे वही दिखाऊँ ऐसा दर्पण हूँ मैं

तेरी यादों में जगती हूँ
यादों में ही सोती
तुझे देखकर ख़ुश हो जाती
तेरे बिन मैं रोती
तू ही मेरा दिल है दिलबर, जिसकी धड़कन हूँ मैं
तू जो चाहे वही दिखाऊँ ऐसा दर्पण हूँ मैं

कितना प्यार भरा है दिल में
इसको तोलूँ कैसे
जब ख़ामोशी बोल रही हो
तो मैं बोलूँ कैसे
तू ही मेरा प्रेम-यज्ञ है समिधा-अर्पण हूँ मैं
तू जो चाहे वही दिखाऊँ ऐसा दर्पण हूँ मैं


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