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06.03.2012

मेरी डायरी से -

मेरी डायरी से -
बाहर टिकटघर की छोटी-सी खिड़की
खिड़की से झाँकती
दो बूढ़ी आँखें!
छोटी-सी कतार
स्वदेशी-विदेशी सैलानियों की -
मैं भी टिकट खरीदती हूँ।

जनाब, ये कभी हवेली थी!
आज हैरिटेज है!
विषमताओं का प्लास्टर!

हवेली का द्वार!
विशाल!
समृद्ध भारत की परी-कथा -सा
समूची भव्यता के साथ
खड़ा है
समय के कोटर में!

बंद झरोखों में लगे
तिकोने, गोल, रंगीन शीशे!
उनसे आती सूरज की किरणों से जूझता
मेरी संस्कृति
तेरा इतिहास
सोन-चिरैया होने का साक्ष्य देता -
खंडित-रक्षित मूर्तियों में
दीवारों की नक्काशी,
पपड़ाये, झूलते प्लास्टर
अदब से फैले बेल-बूटे
एक तिलस्म!
हवेली में पड़ा है!

मैं पलभर के लिए इसका हिस्सा बन गयी हूँ!
कक्ष पर कक्ष!
तिलस्म पर तिलस्म!
क्लिक ..क्लिक.. क्लिक ..
कैमरे में कैद
कितने सारे ज़ूम..
उहूँ! सब खींच डालूँगीl

ये कक्ष हवेली की विधवाओं का है -
एकदम परली तरफ,
संसार से अलहदा!
सफ़ेद कपड़ों में लिपटी
सिसकियाँ..सिसकियाँ .. सिसकियाँ
गुमनाम खोह से आती ...
वर्जनाओं की पदचाप!
शायद भ्रम!
भ्रम समझ बढ़ती हूँ!!
तभी मेरा आँचल कहीं अटक जाता है!
एक तस्वीर -
मुंडा सिर!
सूनी आँखें!
सदियों से नम!!
ओह! यही था नेपथ्य में!
कोई पर्दा गिरता हैl
बिना करतल किये
उठती हूँ
चलती हूँ
एक नारी को ढोते!
क्या करूँ ?
विक्षोभ से ओंठ काटूँ?
आँखों को भीग जाने दूँ?
मैं सैलानी हूँ!
अतीत को सराहने आई हूँ,
घाव सहलाने नहीं!

तभी एक चमगादड़ सिर से गुज़र जाता है
गुज़रे ज़माने की तरह!
आह! मंडित द्वार के बाहर
चिलकती धूप!
भरभरा कर
ढह जाता है तिलस्मl
आँख मल रही हूँl
फिर आना होगा क्या?


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