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06.03.2012

माँ, क्यों मुझसे खिन्न-खिन्न है?
(डिसलैक्सिक बालक की व्यथा)

माँ, क्यों मुझसे खिन्न-खिन्न है?
कहूँ किसे मैं जाकर मन की,
दुनिया मुझसे भिन्न-भिन्न है।

मेरे नन्हे हाथ कलम को,
ठीक नहीं पकड़ पाते हैं।
न जाने क्यों अक्षर मुझसे,
रूठ-रूठ के भग जाते हैं।
माँ, कुछ ऐसा संभव होता,
अक्षर तेरी अँगुली होते,
जिन्हें थाम मैं आगे बढ़ता
बिना आँख में आँसू बोते।

माँ, तू मुझे गगन दिखलाकर
कहती हाथ बढ़ाऊँ अपने।
पर मेरी नन्ही आँखों में,
सिमटे नहीं धरा के सपने।

बोलो, बिना पंख के कैसे
अंबर की मैं पेंग बढ़ाऊँ।
मैं पतंग हूँ बिन डोर की
कैसे नभ को मैं छू जाऊँ।

बना पराया मन का कोना,
नभ तो पूरा भिन्न-भिन्न है।
किस्से कहूँ मैं मन की,
माँ, तू मुझसे खिन्न-खिन्न है।

मेरी पलकों के मोती चुन,
गालों पर हलके चुंबन बुन।
बाँहों के झूले में भर के,
बोली माँ मधु मिश्री ढरके-

तारों के सुंदर आँगन में,
लगता चंदा ये भिन्न-भिन्न है।
चंदा से चिढ़े-चिढ़े तारे,
लगते देखो खिन्न-खिन्न हैं।

कमल हाथ नहीं आती है
अक्षर भाग-भाग जाते हैं।
पर तेरी भोली बातों में,
सपने जाग-जाग जाते हैं।

तेरे सपनों में लौ पलती,
किसी लपट से भिन्न-भिन्न है।
झुकी हुई सूरज की किरणें,
लगती देखो खिन्न-खिन्न हैं।


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