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04.16.2012

कोई संवाद शेष है

कैंप के बाहर,
सुबह जब मैं कॉफ़ी का मग थामे
चहल-कदमी करते
चुस्कियाँ लेते,
पेड़ की पत्तियों में छिपी बुलबुल तेरा गीत सुनता था,
तो न जाने क्यों मुझे लगता था
कि कोई संवाद होना अभी शेष है
और हमारे बीच कोई सूत्र एक है!!

आज जब मेरा सीना चीर कर
दुश्मन की गोलियाँ आर-पार हो गयीं हैं
और मेरी साँसे कुछ शेष रह गयी हैं,
तो बुलबुल...
वह सूत्र मेरे हाथ लग गया है,
और संवाद अब ओंठ पर ढरक गया है।

मैं अपने संवाद तेरे गीतों में पिरोना चाहता हूँ,
एक ख़त तेरे परों पर उकेरना चाहता हूँ।

मगर तुम बारूद के आकाश से डर कर
चाँद की टहनी पर जा बैठी हो !
और हताश इस सूत्र को शून्य में ढूंढ़ रही हो !

मैं गाँव, घर, डगर पीछे छोड़ आया था
पर हर छूटा लमहा तेरे गीत में पाया था।

तेरे गीत
माँ की टुहुक-से ममता भरे थे,
तुम्हारे गीत पत्नी की चिहुक-से प्रेम भरे थे,
तुम्हारे गीत बेटी की किलक-से बचपन भरे थे !

तुम चाँद छोड़ मेरी बाँहों के नीड़ में आओ,
डर छोड़कर, संदेशों के तिनके ले जाओ,

मरने से पहले बड़ी याद आई है
वह गुलमोहर - उसकी छाँव!
छाँव में बसा महकता मेरा गाँव!

रहट-रहट मेरी साँस हुई!
छलक-छलक शेष आस हुई!
तू इन आस के तिनकों को
अपनी चोंच में दबा
हौले से ले जाना!

गुलमोहर की डाली पर!
लाल-लाल फूलों पर!
किसलय पत्तों पर!
घर के छप्पर पर !
द्वार-गली पर!
माँ के आँचल पर!
पत्नी की चूड़ी पर!
बिटिया के ओठों पर!
संवाद बना छोड़ आना

मेरी पार्थिव देह तिरंगे में
जब राजधानी आये -
तो बुलबुल
तू वहीँ-कहीं छाँव में
एक राग छेड़ना-
जिसमें टुहुक-टुहुक
चिहुक-चिहुक
किलक-किलक
यादों का राग हो
देश-रागिनी से दूर
अपना संसार हो! 


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