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06.03.2012

द्रुम डालों के बीच पर्ण की मृदु-छाया में
(उन बच्चों के नाम जो माँ-पिता को भूल गए हैं)

द्रुम डालों के बीच पर्ण की मृदु-छाया में,
कौन तृणों को चुन-चुन कर है नीड़ बनाता?
लीरी, पंख, चूड़ी, धागों से उसे सजाता।

द्रुम डालों के बीच पर्ण की मृदु-छाया में,
कौन नीड़ में बैठ प्रेम के शंख बजाता?
संगमर्मर-से अंडों के शिवलिंग सजाता।

द्रुम डालों के बीच पर्ण की मृदु-छाया में,
कौन फैलाएगा पंख राख-सा जलता रहत।
इसी राख में जीवन का सोना है ढलता।

द्रुम डालों के बीच पर्ण की मृदु-छाया में,
कौन साँझ को, दानों के मोती भर लाता
और चोंच से चोंच मिलाकर उन्हें खिलाता।

द्रुम डालों के बीच पर्ण की मृदु-छाया में,
कौन पंख को पालों-सा मज़बूत बनाता
और पवन में नौका-सा तिरना सिखलाता।

द्रुम डालों के बीच पर्ण की मृदु-छाया में,
कौन देखता मूक, शून्य बूढ़ी आँखों से
मन-छौना लौटेगा? पूछे इन पाँखों से।


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