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04.16.2012

भारतीय दीवारें

गोबर से लिपी
जीवन के चित्र खींचती
कहीं घूँघट में हँसती
हुक्के के अलाव में गरमाती
जौ की कनातें सजाती
छिपी गुनगुनी धूप से बतियाती
सरसों की पीली रोशनी में
केसर के कुमकुम आकाश लगाती
धान की क्यारियों में
भीगी-भीगी नरमाहट- सी
काली मिट्टी में निपजती
गौरांग नवजात -सी रूई की मखमली गुड़िया !
बरगद के पेड़ की
छाया को समेटती
पीपल की बाँह पर
नीड़ों को सोने देती
बैलों की रुनझुन के
लोक संगीत
सांझ के कोने में
दीप सी जगमगाती
एक दीपावली
एक होली
एक अजान
एक सत्कार
एक नेह
एक मेह
एक नींव ...
उस पर खड़ी भारत की दीवारें ..!

मौसम के थाल में
फूँकती समय के शंख
एक देवस्थान
निर्लिप्त देव प्रतिमा!
अब इन्हें लेना है
किनसे प्रतिकार ?
कैसा प्रतिकार ?
ये नहीं कहतीं ...
तुम्हारा समाज
रोज़ छापता है रीतियों के मांडने,
अन्धविश्वास भरे हाथ के छापे
और ये होकर बेज़ुबान
दुनिया को दिखाती हैं
अपने भारतीय होने की पहचान !
तुमसे अपनापा है इनका!
तुम्हारा है क्या ? लगाव !
तय कर लो
ये करेंगी
यहीं खड़ी
तुम्हारी प्रतीक्षा !
एक आहट सुनी अभी !


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