अपर्णा भटनागर
कविता
कोई संवाद शेष है
कौतूहल
द्रुम डालों के बीच पर्ण की मृदु-छाया में
भारतीय दीवारें
माँ, क्यों मुझसे खिन्न-खिन्न है?
मेरी डायरी से -
मैं हूँ न तथागत
लघु बिरवा