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ISSN 2292-9754

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02.28.2018


भूख का इंक़लाब

जब तुम दलीलें दे रहे थे
भूख से नहीं मर रहे बच्चे,
रिक्शा चालाक और मज़दूर,
तब सड़क पर खड़े एक भिखमंगे ने
फेंक दिया था खोलकर
अपने शरीर पर बचा
एक मात्र अधोवस्त्र,
खड़ा हो गया था नंगा
शासन के ख़िलाफ़!
कि नंगे का सामना
नंगा ही कर सकता है,
भूख भूखे को ही जिबह करती है,
लील लेती है बेरोज़गारी
मासूम युवा को,
भूख से आदमी नहीं मरता;
मरती हैं अंतड़ियाँ,
सूख जाता है रक्त
गायब हो जाता है शरीर का पानी,
तब मौत का कारण
कुछ और दर्ज किया जाता है,
'भूख' बिलकुल नहीं।

तुम सच कहते हो मंत्री महोदय!
आज तक एक भी मौत भूख से नहीं हुई,
मौतें हुई हैं तुम्हारे नंगेपन से,
जब मर गया तुम्हारा ज़मीर,
अंधी व्यवस्था ने निगल ली ईमानदारी,
आदमी भेड़-बकरियों की तरह
खड़ा हो गया लाइन लगाकर,
बच्चों ने जान दे दी
तुम्हारी वफ़ादारी देखकर,
मशालें जल गयीं इंक़लाब की,
जी हाँ, ये भूख का इंक़लाब है!!


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