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ISSN 2292-9754

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02.28.2018


लंच बॉक्स से झाँकता समाजवाद

बच्चों के लंच बाक्स से
झाँकता है समाजवाद,
कि कुछ डिब्बों में रखी होती हैं
करारी- कुप्पा तली हुयी पूरियाँ,
और कहीं,
चुपके से झाँकती है
तेल चुपड़ी तुड़ी-मुड़ी रोटी,
कुछ बच्चे खाते हैं
चटखारे लेकर-लेकर
बासी रोटी की कतरने,
तो कुछ;
देशी घी में पगे हलवे को भी देखकर
लेते हैं ऊब की उबासी,
ये सिर्फ़ लंच बाक्स नहीं हैं जनाब!

ये है उनके बाप की कमाई का पारदर्शी नक़ाब,
माँ की सुघड़ता का नमूना,
कुक की नौकरी कर रही
माँओं की मजबूरी लिखी स्लेट;
जो दूसरों के टिफ़िन को -
लज़ीज़ पकवानों से सजाने से पहले,
जल्दी-जल्दी ठूँसती हैं
अपने बच्चों के टिफ़िन में
बासी चावलों को बिरयानी की शक़्ल में;
और करती हैं मनुहार,
खाली कर देना डब्बा;
वरना मेरी आत्मगलानि मुझे जीने नहीं देगी।


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