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ISSN 2292-9754

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11.24.2014


विडंबना

सूरज के छिपते ही
अँधेरे के साथ
जंगलों से निकल आता है - जाड़ा
और
झोपड़ी में घुसकर
पसलियों में धँस जाता है
फिर
रात भर किटकिटाते हैं दाँत
तभी किसी हवेली में
उग आता है
सूरज...
चुपके से
रात को ही


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