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ISSN 2292-9754

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11.24.2014


स्वयं से स्वयं तक

एक जंगल है - चेहरों का
मेरे अंदर
जिसमें से होकर गुज़रती है
यादों की
एक पगडण्डी
इसी पगडण्डी पर
घंटों विचरता रहता हूँ मैं
अपने बिस्तर पर लेटा
रोज़ रात को -
चेहरों के पास और
दूर से गुज़रता
उन्हें छूने की कोशिश करता ……।
आगे चलकर
पता नहीं कब
यादों की ये पगडण्डी
हज़ारों पगडंडियों में
बदल जाती है ....
इन्हीं पगडंडियों में भटकता हुआ मैं
खो जाता हूँ
पता नहीं कब
सो जाता हूँ
अपने बिस्तर पर लेटा
रोज़ रात को


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