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ISSN 2292-9754

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11.16.2014


राग - रंग

एक शाम
सन्नाटे की चादर ताने
बिछी संध्या में
हौले-हौले गुनगुनाती नदी के संग
बहने लगा मेरा मन
मैं बैठ गया -नदी से सटकर
लहर आई
मैंने लहर को
लहर ने मुझको छू लिया
एक क्षण जी लिया
क्रम चलता रहा
पुल के उस पार
सुस्ताने चला गया सूरज
संध्या की स्वर्णाभा के पीछे से
एक धुंधली सी नीलिमा
लगी झाँकने -मेरे मन का विस्तार नापने
नदी रक्ताभ हो उठी
संग आकाश के
नदी ने बाहें पसार दीं
मैं समा गया
नदी ने मेरा रोम-रोम छुआ
मैं हुआ
नदी मुझमें
मैं नदी में
रात भर बहते रहे
एक दूजे में .........


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