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ISSN 2292-9754

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03.14.2015


मैं वो गीत ढूँढ़ता हूँ

जो है पर कोई गाता नहीं
लय तो मिलती है मगर
शब्दों का बहीखाता नहीं

आओ ढूँढते उस ओर चलें
जहाँ कोई आता जाता नहीं
कुछ खोया था वहीँ कहीं
अँधेरे से कोई ढूँढ पाता नहीं

उसी राह, फिर उनसे मिलें
जो अपने नहीं, जिनसे कोई नाता नहीं
कुछ पल साथ बितायें
पूछें, क्यूँ ऐसे रिश्ते कोई निभाता नहीं

धीरे धीरे एक जग यूँ बनायें
जो किसी सीमाओं में समाता नहीं
रंग-भेद जात-धर्म ऊँच-नीच से
आदमी आदमी को भरमाता नहीं

इसी तरह हर वो ख़्वाब देखें
जिससे कोई घबराता नहीं
जो हर आँख में शामिल है
पर किसी आँख का कहलाता नहीं

मैं वो गीत ढूँढ़ता हूँ
जो है पर कोई गाता नहीं
लय तो मिलती है मगर
शब्दों का बहीखाता नहीं


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