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ISSN 2292-9754

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11.25.2014


मैं तो कोई कवि नहीं

मैं तो कोई कवि नहीं,
बस संग्रह हूँ कुछ भावों का
शब्दों के पाल उठाये मैं,
एक मांझी हूँ कुछ नावों का

कगाज़ पर जो भी उभरते हैं,
वह मेरे मनो-विकार हैं
गर रस है तो जीवन का है,
विचारों के अलंकार हैं
साहित्य तो एक सागर है
काव्य मात्र एक धारा है
बहता हुआ सा पत्थर हूँ
मैं इसके तेज़ बहावों का
मैं तो कोई कवि नहीं,
बस संग्रह हूँ कुछ भावों का

हर युग में कुछ कवि हुए
उनसे फिर एक वाद बना
मैं युग-वाद से परे पृथक
स्वछंद भाव अनुवाद बना
साहित्य इतिहास के पन्नों का
एक अक्षर भी नहीं मैं शब्दों का
मैं फिर क्यूँ ख़ुद को बहलाऊँ
मैं कोई पुतला नहीं छलावों का
मैं तो कोई कवि नहीं,
बस संग्रह हूँ कुछ भावों का


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