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ISSN 2292-9754

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11.25.2014


कविता हूँ

कुछ पंक्तियाँ मिली किताब में
कहने लगीं कि कविता हूँ
शब्दों के सागर से निकली
बहती हूँ ज्यों मैं सरिता हूँ

जाने कितने भावों को ले
कई बार कई नावों में ले
बहती रही हूँ अनवरत मैं
गर थम गयी तो पतिता हूँ

हर रंग लिए हर रूप लिए
कभी छाँव कभी तो धूप लिए
हर मौसम से पहचान किये
कभी ग़ज़ल कभी तो संहिता हूँ

मैंने समय का साथ निभाया है
कई इतिहास को ख़ुद में समाया है
ये सफ़र मेरा बरसों का है
युग-युग भटकी, मैं अमिता हूँ


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