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ISSN 2292-9754

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01.01.2016


जीवन की आशा

मानव की परिभाषा क्या
अन्तःमन की भाषा क्या
निराशा तो आनी ही है
नहीं तो जीवन की आशा क्या

कुछ भावों के संग्रह से
मानव मन के अनुग्रह से
स्वप्न विघटित होते ही हैं
नहीं तो फिर अभिलाषा क्या

गिरते नहीं तो सँभालते क्या
डरने वाले फिर चलते क्या
तुम ख़ुद ही ख़ुद के परखी हो
सोचो ख़ुद को तराशा क्या

मन में है ये नफ़रत क्यूँ
इंसान की ऐसी फ़ितरत क्यूँ
छोटा सी ही ये जीवन है
उसमें जीना ज़रा सा क्या


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