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ISSN 2292-9754

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02.06.2015


मैं धरा!

बासंती हो जाऊँगी मैं
जब बसंत तुम आओगे
हो जाएगी चुनरिया मेरी
धानी से पीली
बड़े पेड़ खोंस लेंगे
अपने माथे पे
रंगबिरंगी पतंगें
और सज कर
वे हो जाएँगे
कुछ ज़्यादा सुन्दर।
मोड़ों पर दिखेगे
चिड़ियों के पेड़।
गुलमोहर खिला होगा
पलाश और गहरा होगा।
खेत भर जाएँगे
सरसों के फूलों से.
हवा गुनगुनाएगी
मैं भी बिछी गाती हूँ
तुम्हारे लिए
मनुहार गीत
बसंत, तुम कब आओगे.
बासंती मुझे कर जाओगे!


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