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ISSN 2292-9754

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06.14.2016


गंगा

मेरी उम्र कोई 10 बरस की रही होगी, जब घर में गाय ख़रीदी गई। गंगा का ख़रीदा जाना घर के लोगों के लिए किसी आयोजन से कम नहीं था। गंगा माँ के मायके वाले गाँव अजरका से ख़रीदी गई थी। कहते हैं कि अजरका की गाय अच्छी होती हैं। कोई चार फुट ऊँची गंगा, मोटी–मोटी आँखों वाली, सफ़ेद झक्क - सी थी। सीधी इतनी कि मेरा 7 वर्ष का भाई उसके नीचे बैठ जाता तो भी वह वैसे ही खड़ी रहती। गंगा को हमारे घर मोराडी गाँव का रामसहाय लाया था। रामसहाय पिताजी को एक बार रेल में मिला था और फिर पिताजी का उस पर स्नेह बढ़ता गया। वो घर पर आता तो हमें अच्छा लगता। माँ कभी–कभी उससे अंगीठी में जलाने के लिए कुछ लकड़ियाँ फड़वा लेतीं। वह लकड़ियाँ फाड़ता कुछ और काम भी ऐसे कर देता जिनके बारे में यह समझा जाता था कि ये काम गाँव वाले अच्छी तरह कर सकते हैं। रामसहाय कभी-कभी अपनी पत्नी और दो बच्चों को भी साथ में लाता जिसमें बड़े बेटे का नाम गिर्राज और छोटे का नाम एम.पी. था। हम भाई–बहन उसके छोटे बच्चे के नाम पर हँसते थे। रामसहाय की पत्नी हमारे माँ–पिता से घूँघट में सास–ससुर का क़ायदा करती। रामसहाय का पूरा परिवार हमारे बरामदे में नीचे ही बैठता था। बरामदा घर का एंट्रीप्लेस था। उस समय कभी मेरे दिमाग़ में भी नहीं आया कि हम रामसहाय और उसके परिवार को अन्दर ड्राइंग-रूम में क्यों नहीं बिठाते? हम उसे चाचाजी क्यों नहीं कहते? हम रामसहाय आ गए हैं कि जगह आ गया है क्यों कहते?

रामसहाय जब अजरका से गंगा ले कर चला तब रास्ते में 4-5 दिन पैदल आने में लगे। हम सोचते आज गाय आएगी, आज गाय आएगी, यही सोच कर हम तीन बहन-भाई गाय के स्वागत में पहनाने के लिए चाँदनी के फूलों की मोटी-मोटी माला बनाते। उनके बीच-बीच में मधुमालती के फूल कुछ-कुछ दूरी पर डाल कर डिज़ाइन भी बनाते। जब गाय आई तब उसे फूलों की माला पहनाई, गुड़ खिलाया, माँ ने उसके सामने पानी डाल कर उसका गृहप्रवेश करवाया। पिता ने उसके ऊपर हाथ फेर कर उसे दुलारा इस गाय का नाम माँ ने गंगा रखा। पिता को भी गंगा से बहुत प्यार था उन्होंने गंगा के साथ एक फोटो खिंचवाई थी। गंगा के दो बेटे हुए, माँ ने गंगा के बड़े बेटे का नाम गोविन्द और छोटे का नाम गोकुल रखा। गंगा और उसके बेटों से हम ऐसे ही बात करते जैसे किसी इंसान से करते हैं। वह और उसका परिवार हमें हमारे घर का सदस्य ही लगता था। गंगा का दूध मेरी माँ या बड़ी बहन निकालते, सानी करते, माँ छाछ बिलोतीं, बीच वाली बहन उसका गोबर थापती। मैं और छोटा भाई उसके बीमार होने पर पशु चिकित्सालय ले कर जाते। पिताजी ने हमें एक-दो बार साथ में अस्पताल ले जा कर उसका का रास्ता बता दिया था।

पिताजी रेलवे में मेलगार्ड थे इसलिए घर पर रोज़ उनका रहना संभव नहीं था। घर के सभी सदस्य गंगा की सेवासुश्रुषा में किसी न किसी तरह जुड़े थे। गंगा को जब मैं और मेरा भाई अस्पताल ले कर जाते तो कुछ दूर तो वह आराम से चलती लेकिन जैसे ही उसे लगने लगता कि हम उसे अस्पताल ले कर जा रहे हैं तब वह बिलकुल अड़ जाती तब जैसे-तैसे कर के हम में से एक जना पूरी ताक़त से उसे खींचता और एक जना हाथ में डंडी से उसे धकियाता तब कहीं वह अस्पताल पहुँचती। अस्पताल ले कर जाना हमारे लिए मुश्किल काम था। हाँ आते समय हम उसकी पीठ पर रस्सी डाल देते और वह लगभग 4 किलोमीटर बिना किसी हमारे दिशानिर्देश के आगे-आगे चलती और हम दोनों उसके पीछे-पीछे मज़े करते हुए घर आते।

गंगा का बड़ा बेटा गोविन्द अब बड़ा हो रहा था, सो उसे आर्थिक और सामाजिक परम्परानुसार किसी किसान को बेच दिया गया जैसे किसी लड़की के बड़े होने पर उसे परणाना ज़रूरी होता है। गंगा ने उस समय उसकी याद में अपने खूंटे के चारों तरफ़ चक्कर काट-काट कर सारी ज़मीन खोद डाली। यही गोकुल के बड़े होने पर हुआ। गोकुल भी अपनी किशोरावस्था में परणा दिया गया। दोनों बेटों के परणा दिए जाने के बाद गंगा अकेली हो गई, दूध भी कम देने लगी। कुछ समय बाद गंगा भी सस्ते में बेच दी गई। गंगा के जाने से घर में एक-दो दिन तो थोड़ी उदासी रही। फिर सब सामान्य हो गया। ……मेरी रसोई की खिड़की के बाहर एक हरसिंगार का पेड़ लगा है जो कि बारिश के दिनों में बहुत कम दिन फूल देता है मन करता है कभी-कभी कि उसे हटा कर कोई और उपयोगी पेड़ लगा लूँ पर उसे हटाने की हिम्मत नहीं कर पाती हूँ…. !


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