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ISSN 2292-9754

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10.16.2014


बेघर बच्चों का घर

अजमेर, राजस्थान के प्लेटफॉर्म पर रहने वाले बच्चे कचरा बीन कर कबाड़ी को बेचने, ट्रेन में पेपर सोप बेचने और होटल पर कप-प्लेट धोने का काम करते थे। एक बार दिवाली से पहले उन्होंने थोड़े-थोड़े पैसे इकट्ठे किए और फिर उनसे कुछ-कुछ नए कपड़े खरीदे। ये कपड़े वे दिवाली पर पहनने वाले थे। परन्तु तब तक इन्हें रखने के लिए उनके पास कोई सुरक्षित जगह नहीं थी। इन कपड़ों को उन्होंने रेलवे यार्ड में खड़े एक डिब्बे में छुपा दिया। डिब्बा बहुत दिनों से वहीं खड़ा था परन्तु एक दिन डीज़ल उस डिब्बे को ले गया। यह बात मुझे उनमें से एक बच्चे ने हँस-हँस कर बताई। यह बात अब भी हँसाती कम, रुलाती ज़्यादा है।


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