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03.06.2009
 

पहचान - अपनी
अनुला


तुम लोग हमें क्या समझोगे, हमें समझा आग और पानी ने।
धू धू कर जलती लपटों ने, झरने की तेज़ रवानी ने॥

हमने तो कभी जाना ही नहीं, कब दिन डूबा और साँझ हुई।
जब चला किए तब समझा दिन, थक कर बैठे तो रात हुई।
आगे चलने की कोशिश की, नाकाम रही तो जाने दो,
बाँधा ही नहीं उजालों ने, अँधियारी आनी - जानी ने॥

वर्षों की लम्बी कठिन डगर, तय हो चुकने को आई है।
ऊबड़ - खाबड़, बंजर बीहड़, ठोकर भी अक्सर खाई है।
गर्मी की लपटों से झुलसे, पानी बरसा तो भीग लिए,
रोका ही नहीं ठोकरों ने, या मौसम की मनमानी ने॥

दुनिया को अपनी प्यार किया, जैसी भी है, यह अपनी है।
कुछ अनचाहा, कुछ मनभाया, दोनों से मिलकर बनती है।
जब इष्ट मिला तो हरषें हम, कुछ बुरा लगा तो रोए भी,
जीवन सुख दुःख से रंजित है, समझाया सीख पुरानी है॥


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