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08.17.2008
 

मैं ढूँढती हूँ जिसे वो जहां नहीं मिलता
अनुला


मैं ढूँढती हूँ जिसे वो जहां नहीं मिलता।
कहीं पे धूप, कहीं सायबां नहीं मिलता॥

रात आई तो रुकी ऐसी कि जाएगी नहीं।
नई सुबह का यहाँ कुछ निशां नहीं मिलता॥

रात भर बाँधा किए मुख़्तसर सामां अपना।
नए सफ़र के लिए रहनुमां नहीं मिलता॥

पंख में ज़ोर तो उड़ने को आस्मां बेहद।
थक के सुस्ता लें जहाँ, आशियां नहीं मिलता॥

पासबां बनने के क़ाबिल नज़र आते हैं सब।
क्या करें खु़द को ही कोई मकां नहीं मिलता॥

यूँ तो मिलते हैं बहुत अश्क़ पोंछने वाले।
दर्दे दिल सुने, समझे, राज़दां नहीं मिलता॥

दर्द सीने में औ’ लफ़्ज़ों की बरात ओंठों पर।
मेरी ग़ज़ल में सही काफ़िया नहीं मिलता॥


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