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03.06.2009
 

डेड-एंड
अनुला


आँखें जब खोलीं तो जैसे चौंधिया गईं,
सम्मुख एक दुनिया थी, अनजानी, अनबूझी।
                        रंग बहुत फैले थे,
                                     लोगों के मेले थे।
उनमें कुछ अपने थे, बोधक और उत्प्रेरक।
पकड़ हमारी उँगली, चलन सीखाया था,
गढ़ों से बचाया था, मार्ग सम दिखाया था।

                        थोड़ा चल चुकने पर,
                        पैर सध जाने पर,
                                     कुछ साथ छूट गया,
                                     मिलता गया नया।
सफ़र ख़ुशगवार लगा, चलने में रस आया।
हमें पता ही न चला, रस्ता कब कट आया।
चला किए, थका किए, मगर अब ख़याल आया,
कौन चुकेगा पहले, रस्ता या ख़ुद हम ही?

कुछ दूर और चले, तब औचक ठमक गए।
सम्मुख एक बोर्ड खड़ा, डेड एंड लिखा हुआ।
पीछे मुड़ कर देखा, जाने की राह नहीं,
वन वे स्ट्रीट थी, आगे डेड एंड था।
चाह बहुत, राह नहीं, आगे न पीछे, दाएँ न बाएँ
चलते हम आए थे, मंज़िल तलाशते।

अब हमने समझा, मन ने यह माना,
कुछ भी न पाना था, कहीं न पहुँचाना था।
चलना ही पाना था, जो अब चुक आया था।
रस्ता ही मंज़िल था, जो अब कट आया था॥


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