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ISSN 2292-9754

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02.17.2016


यादें - विद्यालय का पहला दिन

जब मैंने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की उसके बाद मुझे कतई आशा नही थी कि मैं कुछ ही दिन में बहुत से नए दोस्तों से मिलूँगा, पर जैसे ही मैं इंटर करने के लिए कर्वी गया तो मुझे पता चला कि यहाँ तीन ही विद्यालय बहुत अच्छे हैं - १. बैजनाथ भारद्वाज सरस्वती विद्या मंदिर; २. जी.डी.एन.डी. विद्या मंदिर इंटर कॉलेज; ३.चित्रकूट इंटर कॉलेज चित्रकूट। उस समय बैजनाथ भारद्वाज सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज नंबर एक पर था। मैंने निश्चय किया कि मुझे यहीं से इंटर उत्तीर्ण करना है।

प्रवेश परीक्षा देने के बाद मेरा एडमिशन विद्द्यामंदिर में हुआ, जब मैं पहली बार क्लास में गया तो सबसे पहिले प्रधानाचार्य श्री शिवबरन त्रिपाठी जी मिलें जो बहुत ही अच्छे हृदय और अनुशासन पसंद करने वाले व्यक्ति थे जिनके चरण स्पर्श करके मैं आगे बढ़ा। जैसे ही मैंने कक्षा के अंदर प्रवेश किया, क्लास पूरी तरह भरी हुई थी, मुझे लगा शायद मेरा ही इन्तज़ार हो रहा रहा था। कक्षा की कुल संख्या उस समय ५८ थी। तीसरी पंक्ति में चौथी सीट जो मुझे खाली दिख रही थी मैं उसपे जाकर बैठ गया। सभी लोग मुझे देख रहे थे शायद सभी जानना चाहते थे कि ये नया छात्र कौन है? कहाँ से आया है? और इसके हाईस्कूल में कितने मार्क्स थे? तभी अचानक क्लास में एक मीडीयम क़द के, पर अपनी आवाज़ से सभी को शांत करने वाले टीचर उपस्थित हुए। तभी क्लास से एक तीव्र आवाज़ आयी 'उत्तिष्ठ' सभी खड़े हो गए और सभी को देखकर तुरंत मैं भी खड़ा हो गया। फिर यही कोई १५ सेकेण्ड के बाद गुरुजी ने संकेत किया कि सभी बैठ जाएँ। मैंने जब बगल में बैठे आलोक सिंह से पूछा कि ये कौन है तो उसने बताया कि ये हमारे कक्षाध्यापक श्रीमान शिवनायक जी हैं मैं उनकी तरफ एक टक निगाहों से देखता रहा। अचानक उन्होंने तेज़ी से कहा सभी शांत हो जाएँ अगर सबकी बातें ख़त्म हो गई हों। फिर उन्होंने कहा यहाँ पे मुझे कुछ नए चेहरे दिख रहे हैं कृपया वो छात्र अपना परिचय पूरी क्लास को दें।

सबसे पहिले अंकित त्रिपाठी जो कि नरैनी से था; उसने थोड़ा 'हकलाते' स्वर में अपना नाम बताया और सारी जानकारी दी। उसकी बातें सुनकर सभी लोग ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाने लगे। तभी गुरुजी ने तेज स्वर में सभी को शांत किया और कहा अभी वो नया है, शायद इसलिए थोड़ा सा नर्वस है। वो थोड़ा सा मायूस होकर फिर अपनी सीट में बैठ गया। मुझे पता था कि नयी जगह पर कुछ लोग अपने आप ही नर्वस हो जाते हैं और हँसने वाले ये भूल जाते हैं कि वो भी कभी ना कभी इस तरह इस कॉलेज में नए आये होंगे! इसके बाद पुष्पेन्द्र मिश्रा ने जो कि छिबों से आया था, खड़े होकर सधी हुई आवाज़ में अपना परिचय पूरी क्लास को दिया (बड़ी गंभीरता से...)। इसके बाद मेरा नंबर आया, मैं भी खड़ा हुआ और मैंने बताया कि श्रीमान मेरा नाम अनुज कुमार द्विवेदी है और मैं मानिकपुर का मूल निवासी हूँ। मैंने हाईस्कूल परीक्षा ए.आई.सी. से उत्तीर्ण की है। इसके बाद बाक़ी बचे लोगों ने अपना अपना परिचय पूरी क्लास को दिया। तभी अचानक दूसरे पीरियड का घंटा बज गया और गुरुजी ने कहा कि कल सभी लोग एक-एक लेख लिखकर लायेंगे।

इसके बाद जैसे ही हम सब थोड़ा रिलैक्स हुए थे कि अचानक क्लास में यही कोई ६ फीट से कुछ ज़्यादा और दिखने में कुछ ज़्यादा ही कड़क जो कि हमारे अंग्रेज़ी के गुरुजी थे। उनका नाम श्री प्रशांत द्विवेदी था और ऐंचवारा के मूल निवासी थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. (अंग्रेज़ी) से किया था। उन्होंने सभी पुराने छात्रों से मीठे स्वर में पूछा "कैसी रही छुट्टियाँ?" सभी ने कहा - बहुत अच्छी गुरुजी। उन्होंने भी पूछा कि खड़े हो जायें जिन्होंने इस साल नए एडमिशन लिए हैं। हम अपनी-अपनी सीटों पर खड़े हो गए और सभी ने बारी-बारी से अपने बारे में बताया। जब मेरा नम्बर आया तो जैसे ही मैंने बताया कि मैं मानिकपुर से हूँ, उन्होंने कहा कि पिछले दो बैचों में भी एक-एक लड़का मानिकपुर से था। दोनों काफ़ी अनुशासनहीन थे, कहीं तुम भी.....? मैं चुप रहा, मैं कोई जवाब नहीं दिया। फिर उन्होंने पुराने छात्रों से हाईस्कूल के नम्बर पूछे - सबसे पहिले उन्होंने कहा कि जिसके सबसे ज़्यादा नंबर आये हों वो खड़ा हो जाये। पहिले नंबर पे एक छात्र खड़ा हुआ जिसने अपना नाम अभिषेक त्रिपाठी बताया। उसने बताया की मेरे ८५% नबर आये। इसके बाद किसी ने ८४ % किसी ने ८३% तो किसी ने ८२% यानी कि यही कोई १५ छात्र ८०% से ऊपर रहे। बाक़ी अधिकतर लड़के ७०% से ऊपर थे, कुछ एकाध ६०% से ७०% के बीच थे। सबके नंबर सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ कि काश मैंने भी हाईस्कूल को क्रिकेट का खेल ना समझा होता जबकि मैं जिस स्कूल से गया था वहाँ मैं टॉपरों की लिस्ट में था पर यहाँ आकर पता चला कि नम्बर क्या होते हैं! क्लास के अन्य सभी लोग पूरे आत्मविश्वास से भरे थे पर मैं ख़ुद के विचारों को एकीकृत कर रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि "अब डरने से कुछ नही होगा; अब तो आगे की पढ़ाई यहीं से करनी है"।

इसके बाद तीसरा पीरियड लगा और वो मैथ का था। मैंने बायो ले ली थी यानी अब हमें अपनी क्लास में जाना था। जैसे मैं बायो की क्लास पहुँचा वहाँ थोड़ा सन्नाटा था। वहाँ पे एक व्यक्ति किसी पौधे को सीधा कर रहे थे। शायद वो पत्थर से ढँक गया था। वो मेरे पास आये और उन्होंने पूछा तुम्हारा क्या नाम है? मैंने कहा "अनुज।" ... जैसे ही मैं अपनी क्लास के अंदर गया तो वहाँ केवल दो लड़के ही बैठे थे और मैं तीसरा। जब मैंने उन दोनों से पूछा अभी और इतने बच्चे हैं तो उन्होंने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि बस हम तीन ही। यानी कि मैं तीसरा और अंतिम छात्र था। इसके बाद वही व्यक्ति क्लास के अंदर आये एक ने कहा 'उत्तिष्ठ' हम तीनों उठे और फिर उनके संकेत पर बैठ गए। मुझे तब पता चला कि ये जीवविज्ञान के गुरुजी हैं। उनका नाम श्रीमान रवि अग्रहरी था। उन्होंने कहा कि इस विद्यालय का ये इंटर का तीसरा बैच है और मेरी बायो की क्लास में तीन बच्चे। मुझे थोड़ा डर लग रहा था क्योंकि मेरी विज्ञान से सीधी टक्कर तो कई बार हो चुकी थी पर जीव विज्ञान से ये मेरी तीसरी और पहली सीधी मुलाक़ात थी। …जैसे-तैसे कुछ पीरियड और बीते। फिर मध्यावकाश, जिसे हम अंग्रेज़ी में इंटरवल कहते हैं सभी लोग क्लास से अपना-अपना टिफिन लेकर पंक्तिबद्ध निकले और जाकर लाईन से बैठ गए। तीन बच्चों को भोजन मंत्र के लिए खड़ा किया गया जिनके साथ सभी ने मंत्र दोहराए और फिर सभी ने एक साथ अपने अपने टिफिन खोले और सबने खाना शुरू कर दिया। पर कुछ ऐसे भी थे जो टिफिन नही लाए थे। उनमें से एक मैं भी था। पर वहाँ का नियम था कि जो टिफिन लाना भूल गए हैं वो भी मिल बाँटकर खाएँ। सबके साथ बैठकर खाने का अनुभव मेरे लिए बहुत अलग था पर बहुत अच्छा लग रहा था कि सभी एक साथ इतने प्रेम से भोजन कर रहे हैं। मुझे उस दिन पहली बार आदर्श भारत के दर्शन हुए जहाँ पर बिना किसी जाति के भेदभाव सबको समानता से शिक्षा दी जा रही थी। ये मेरे लिए अविस्मरणीय़ पल था जिसे मैं कभी नही भूल पाऊँगा।

उस दिन मेरी क्लास का पहिला ही दिन था पर आधे समय में ही मुझे लगा कि अब मैं सबसे उच्च जगह पर आ गया हूँ (शिक्षा की दृष्टि से)। जैसे-तैसे मेरा कॉलेज में पहिला दिन बीत गया। अंत में छुट्टी से पहिले वन्देमातरम के लिए सभी लोग एक ही जगह पर एकत्रित हुए और मधुर उच्च स्वर में सभी ने वन्देमातरम का गान किया। इसके बाद छुट्टी हो गई और सभी लोग पंक्तिबद्ध होकर कॉलेज से निकले। मैं भी सभी के साथ निकला और घर गया

उसके बाद एक-एक दिन इसी तरह अनुशासन से गुज़रते गए और कब हम सब ने इंटर उत्तीर्ण कर लिया पता ही नही चला। सभी से मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो गई और आज भी मैं सबको बहुत मिस करता हूँ। आज भी वो दिन याद आते हैं। विद्या मंदिर ने एक छात्र के रूप में मुझे बहुत कुछ दिया - सबसे बड़ी बात है उसके दिए गए संस्कार जो आज ज़िंदगी के हर क़दम पर मेरा मनोबल बढ़ाते हैं और मुझे पक्का विश्वास है कि ये संस्कार ही हैं जो हमें एक सच्चा नागरिक बनाते हैं।


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