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06.16.2007
 
उस छूट्टी पर!
अन्तरा करवड़े

सुबह की धूप में
कुछ ठहरे से क्षण थे वो
तुम्हारी सोच ये बहती हुई
मेरी छत पर उतरी थी...
गीले बालों में उलझकर
,
मोती से गिरे थे फर्श पर।

उठाकर सहेजना कितना मुश्किल था!
कितना बारीक सोचते हो तुम ......
ख़ुद में पिरोना मुक्तकों को
,
श्वेत पीत आभा से भरे वे
क्या सचमुच बचे हो अब भी ऐसे
?

मैं कमज़ोर पड़ रही हूँ क्योंकि...
तुम्हारी सोच भारी है मुझपर
तुम्हारी याद ही संबल बनती है
फिर उन्हें ओस के जैसे
सूरज के हवाले कर देती हूँ

हर छूट्टी पर आती है
ऐसी ही कुछ बारिशें तुम्हारी...



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