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| 06.16.2007 |
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उस छूट्टी पर! अन्तरा करवड़े |
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सुबह की धूप में मोती से गिरे थे फर्श पर। उठाकर
सहेजना कितना मुश्किल था! मैं कमज़ोर
पड़ रही हूँ क्योंकि... हर छूट्टी पर आती है |
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