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तुम फूल क्यों नहीं हो जाती
लड़की?
एक रंग तो तय हो जाएगा तुम्हारा
माँ बाप के ताने,
सड़कों की नज़रें
चंद काँटों में हिसाब हो जाएगा सारा
फिर देख करना आसमानों में,
कोई न नापेगा नज़र न बदन
बतियाना भँवरों से खुल के
खोल देना ये मन के बंधन
वक्त जात रिवाज़ों की चक्की
लड़की पिसकर रिश्ते में बंधी
कसौटी की आँच पर तप कर के फूली
खाने में बँटे सपने की खुशबू सौंधी
तुम रोटी क्यों नही हो जाती
लड़की?
एक आकार तो तय हो जाएगा तुम्हारा
धरती से रिश्ता भूखी आँखों में इज्जत
कोई न कहेगा फिर तुम्हें बेचारा
फूला करना अपने अरमानों से
हाथ हाथ से टूटा करना
चूल्हे की आग से पेट की आग तक
आँच आँच तपना प्राणों से
भरे पेट कोई ना पूछे
भूख तुम्हारी किस्मत में
बहती रहना फिर नदी के जैसे
अंधे घ्ए में भूख के पीछे
तुम नदी क्यों नही हो जाती
लड़की?
एक राह तो तय हो जाएगी तुम्हारी
रिश्ते,
दहेज,
तानों से बचोगी
समुन्दर में खो जाएगी मिठास ये सारी
निर्बन्ध लड़की तुम बहती रहना
प्यास मिट्टी की गोद को भरते
फूल मौसम खुशहाली के तले
आँसू सबके पीती रहना
कभी फूल फिर रोटी और नदी सी तुम,
रंग आकारों में राह खोजती,
कभी तो औरत होने से पहले
एक दिन भर को तो लड़की हो जाना तुम...
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