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02.09.2008
 

उसके लिये भी....
अंशु जौहरी


किसी शैतान बच्चे सी,
नम हवा की सिहरन
बंद किवाड़ों की दरारों से घुस कर
मुझे खुले आसमान की आर्द्रता की कहानी
सुनाने लगी

मैं बाहर की बूँदों की टिपटिप से,
कारों के रेले के शोर से,
कभी अधकच्ची या जलती हुई रोटी को
बचाने के प्रयास से,
उसे करती रही अनसुना

फिर लगा कि यह कैसा कंपन है
जो बंद किवाड़ होने पर भी
बार बार खटखटाता है
फुसफुसाता है
मेरी डाँट से चुप होता
पर चुप होकर फिर बतियाता है

मैं अपने प्रश्नों से बेपरवाह,
प्रश्नों के उत्तर से लापरवाह,
जब जब सिमटती व्यस्तताओं में
वह खालीपन बन जाता है

बाँच लेता है वह सिलवटों की भाषा
जो निचुड़ा जल बन कर मैंने
उसके वस्त्रों पर छोड़ी थी
उस अपने निर्धारित बहाव की सीमा
जो ओढ़ी, लाँघी, फिर तोड़ी थी

यद्यपि
मैं बाहर की बूँदों की टिपटिप से,
कारों के रेले के शोर से,
कबी अधकच्ची या जलती हुयी रोटी को
बचाने के प्रयास से,
उसे करना चाहती थी अनसुना
पर फिर भी
किसी शैतान बच्चे सी,
नम हवा की सिहरन
बंद किवाड़ों की दरारों से घुस कर
मुझे खुले आसमान की आर्द्रता की कहानी
सुनाती रही

उसे शायद पता नहीं
एक आर्द्रता यहाँ भी थी, एक कंपन उसके लिये भी


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