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ISSN 2292-9754

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03.23.2016


शहीद की माँ

आता देख क़ाफ़िला
सुन गाड़ियों की गडगडाहट।
विस्मित सी सीना थामे
वो एक माँ…
जिसे पता तक नहीं
कि हो गया है शहीद
लाल उसका सीमा पे
सुबकती सी सिसकती सी
जब रख कलेजे पर पत्थर
देखा उसने कफ़न हटा
हाँ!!! सचमुच यह तो
उसी का लाल था॥
और एक गहरा धक्का
लगा अचानक ज़ोर से
जब देखा उसने लाल के
गोलियों से छलनी बदन को
मगर …………
उस माँ कि आँखों में
नहीं था यह रुदन
शायद उस शहादत का
थी पीड़ा तो बस यही
कि काश ………………
होता एक और लाल
जिसे इस शहादत के बाद
भेज देती सरहद पे
कर देती उसे भी
उस माँ के लिए क़ुर्बान


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