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ISSN 2292-9754

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10.23.2014


सावन मनमीत

सावन की इन फुहारों ने
दिया इस बार मुझे उलाहना।
क्यों नहीं लिखा मैंने?
उनके लिए तराना॥
फुहारों को देख मैंने,
हाथ फैलाकर एक ठंडी आह खिचीं।
सहसा एक बूँद हथेली पर आ गिरी॥
सहमी-सहमी डरी-डरी
कहने लगी मुझसे।
क्या नहीं सुनाओगे कोई गीत?
क्या नहीं बनाओगे हमें?
हर बार की तरह अपना मीत॥
सुन यह बातें उसकी,
मेरी आँख छलक आई॥
और ख़ामोश हो गया मैं,
जिसे भाँप कहने लगी बूँद।
क्या हुआ मेरे भाई?
कहो क्या परेशानी आई?
अब असलियत छुप ना सकी।
ख़ामोशी को तोड़ कहा मैंने,
अब नहीं रहेगी अपनी प्रीत।
ओ! मेरे सावन मनमीत॥
वो जंगल जो तुम्हें,
अपने पास बुलाता था।
जहाँ रिमझिम फुहारों में,
मैं सावन गीत गाता था॥
जहाँ अपनी दोस्ती के,
लम्हें गुज़रते थे।
जहाँ हम मिलकर अक्सर,
बातें किया करते थे॥
वो सचमुच अब,
वीरान हो गया हैं।
मेरे गीतों का तराना भी,
वहीं खो गया है॥
उजड़ गए जंगल
नदियाँ सिमट गई हैं।
कुछ बची थी झाड़ियाँ,
वो भी अब कट गयी हैं॥
यह सुन बूँद खिन्न सी,
हथेली से फिसलकर,
कुछ कहते-कहते गिर गई।
जिसे में उन बादलों की गर्जन से,
स्पष्ट सुन नहीं पाया॥
पर महसूस कर सकता हूँ उसे।
कि शायद वो पेड़ लगाने
की बात कह गयी॥


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